अनूप चौधरी
हरियाणा सरकार के पंचायत चुनाव संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाली दलित महिला कमलेश ने अभी हार नहीं मानी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी है, पर कमलेश अब सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दायर करने की तैयारी में है। हिसार के कैमरी गांव की निवासी कमलेश अपने परिवार की आर्थिक और समाजिक दुर्दशा के चलते स्कूल नहीं जा पाईं। उन्होंने अक्षर ज्ञान भी सक्षरता अभियान के तहत लिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने के साथ ही वह अपने मौलिक अधिकारों की लड़ाई जारी रखेगी।
हरियाणा सरकार ने पंचायती राज संशोधन कानून 2015 के जरिए पंचायत चुनाव में सामान्य उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम योग्यता मैट्रिकुलेशन निर्धारित की है, जबकि महिला (सामान्य श्रेणी) और अनुसूचित जाति (एससी) के उम्मीदवारों के लिए यह योग्यता आठवीं निर्धारित की गई है। एससी श्रेणी की महिला उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम योग्यता पांचवीं रखी गई है। चुनाव लड़ने के लिए इसके अलावा भी कई शर्तें रखी गई हैं। बिजली बिल का भुगतान न करने वालों को भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बताया गया है।
मालूम हो कमलेश ने आॅल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेंस एसोसिएशन की महासचिव जगमती सांगवान के सहयोग से पंचायती राज संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। इसकी सुनवाई के दौरान न्यायालय ने गत 17 सितंबर को चुनाव पर रोक लगा दी थी और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। इसके बाद राज्य सरकार आनन-फानन में अदालत पहुंची थी और उससे रोक हटाने का आग्रह किया था। हरियाणा सरकार के इस संशोधन का चुनौती देने के लिए हरियाणा के छह हजार सात सौ से ज्यादा पंचायतों में ऐसे अकेले दलित परिवार की कमलेश ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। भिवानी जिले के जूही बाढड़ा गांव में एक दलित परिवार में पैदा हुई कमलेश के परिवार वालों की आर्थिक हालत इनता कमजोर थी कि वह स्कूल में पढने की बात तो दूर स्कूल के दरवाजे तक नहीं गईं। ऐसे हालात में प्रदेश सरकार ने उनके चुनाव लड़ने के मौलिक अधिकार को भी छीन लिया है। ऐसी पाबंदियां लगाने से पहले सरकार यह सुनिश्चित करे कि दलित शिक्षित और संपन्नता की ओर बढ़ें।
कमलेश का कहना है कि वह फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की सोच रही है। उन्हें महिला संगठनों और दलित संगठनों का पूरा सहयोग और समर्थन मिलने का भरोसा मिल रहा है। कमलेश फैसले के बाद मायूस जरूर हुई पर अभी हौसला नहीं छोड़ा है। वे हरियाणा सरकार से भी इस संशोधन के बारे में आमने-सामने बैठकर बात करेंगी। उनका कहना है कि सरकार को दलितों और आम आदमी के हक हकूक से कोई सरोकार नहीं है। यही संशोधन लागू हुआ तो 75 फीसद से भी ज्यादा महिलाओं की भागीदारी पंचायती राज संस्थाओं से वंचित रह जाएगी। खास तौर से दलित महिलाओं की भूमिका तो एक तरह से खत्म हो जाएगी। कमलेश ने कहा,‘ मैं अपने मामूली अक्षर ज्ञान के सहारे ही महिलाओं और खासतौर से दलितों के हक की लड़ाई और संघर्ष जारी रखूंगी।’