भारतीय समाज में किसी के निधन पर बेटा ही शव को कंधा और मुखाग्नि देता है। समाज में प्रगति के साथ ही धीरे-धीरे इसमें भी बदलाव आ रहा है। अब बेटियों द्वारा भी शव को कंधा या मुखाग्नि देने के मामले सामने आने लगे हैं। गुजरात में भी बेटियों द्वारा इस कर्तव्य का निर्वाह किया गया है। यह मामला आणंद का है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, देवेंद्र गुजरात बिजली विभाग में बतौर इंजीनियर काम करते थे। वह रिटायर हो चुके थे। सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद वह परिवार के साथ आणंद के बोरसद में ही बस गए थे। बुजुर्ग देवेंद्र का 7 मई को निधन हो गया था। उनकी आठ बेटियों ने न केवल उनकी अर्थी को कंधा दिया, बल्कि सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हुए मुखाग्नि भी दी। उन्होंने अपनी सभी बेटियों की शादी पहले ही कर दी थी। उनके निधन की खबर सुनने के बाद वे सभी बोरसद पहुंची थीं। देवेंद्र के अंतिम संस्कार और श्राद्ध से जुड़े सभी काम बेटियों ने ही किया।
देश की बेटियों ने पहली बार पिता की अर्थी को कंधा नहीं दिया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। इस साल जनवरी में हरियाणा के सिरसा निवासी मंगतराम का अचानक से निधन हो गया था। 65 वर्षीय मंगतराम सत्संग से लौट रहे थे। अचानक से गिरने के कारण उनकी मौत हो गई थी। अर्थी को कांधा देने से उनके अंतिम संस्कार और श्राद्धकर्म तक को बेटियों ने अंजाम दिया था। पूरे क्षेत्र में यह चर्चा का विषय बना था। राजस्थान के सीकर में भी पिता के निधन पर बेटियों ने शव को कंधा देने से लेकर अन्य सभी तरह के सामाजिक कार्यों का निर्वाह किया था। दरअसल, जिले के गुहाला निवासी झांझूराम कैंसर से पीड़ित थे। वह मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह से अपने परिवार का पेट पालते थे। वह मनरेगा के तहत काम कर बेटियों को पढ़ा रहे थे। उनकी बड़ी बेटी रिंकू ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर रही है, जबकि सरोज नौवीं कक्षा की छात्रा है। एक सुबह झांझूराम की मौत हो गई थी। इसके बाद रिंकू और सरोज ने अपने पिता की अर्थी को कांधा दिया था। देश के अन्य क्षेत्रों से भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।

