मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की ओर से दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) अधिनियम में संशोधन कर आवश्यक सेवा संरक्षण अधिनियम, 1968 (एस्मा) लागू करने की कोशिश की जा रही है। हम इसका हर तरह से विरोध करते हैं और किसी भी सूरत में इसे पूरा नहीं होने दिया जाएगा। एकेडमिक्स फोर एक्शन एंड डेवलेपमेंट (एएडी) के अध्यक्ष डॉक्टर आदित्य नारायण मिश्र ने गुरुवार को एक प्रेस वार्ता में यह बात कही। उन्होंने कहा कि इसके लिए 4 अक्तूबर को एक कार्यकारी समूह का गठन किया गया है, जिससे तीस दिन के अंदर रिपोर्ट मांगी गई है।
डीयू शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे मिश्र ने कहा कि विश्वविद्यालय में एस्मा लगाने की सोच संवाद, बहस, बौद्धिक विमार्श की भावना और ज्ञान के भयरहित प्रचार-प्रसार पर सीधा हमला है। इससे निजी शिक्षण संस्थानों की दुकानों का रास्ता साफ हो जाएगा। उन्होंने कहा कि एस्मा केंद्रीय नागरिक सेवाओं का घातक हथियार है। इसे लागू करने के बाद डीयू में शिक्षण-प्रशिक्षण, परीक्षा और मूल्यांकन एस्मा के अंतर्गत आ जाएंगे। मिश्र ने बताया कि डीयू की स्थापना संसद के अधिनियम, 1922 द्वारा हुई है और इसका संचालन इसी अधिनियम के तहत बनाए गए कानून और अध्यादेशों के द्वारा होता है। उन्होंने कहा कि 1922 का यह अधिनियम शिक्षण, अनुसंधान और ज्ञान के प्रसार की गारंटी देता है।
उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय में सवाल पूछने की आजादी नहीं होगी, वहां भला क्या पढ़ाई हो सकती है। इसके माध्यम से सरकार को फंड कटौती के अपने एजंडे को लागू करने में मदद मिलेगी। उन्होंने देश के पूरे शिक्षक समुदाय से आह्वान किया है कि वे उच्च शिक्षा के सामने मौजूद खतरे के सामने खड़े हों और समाज का सार्वजनिक उच्च शिक्षा के सामने आए इस विकट समस्या के बारे में लोगों को जागरूक करें। डूटा के उपाध्यक्ष आलोक पांडेय ने बताया कि एस्मा लागू होने से डूटा भी खत्म हो जाएगा। उन्होंने बताया कि डूटा सदस्यों के चंदे से चलता है और शिक्षकों के मुद्दों की लड़ाई लड़ता है। उनके मुताबिक एस्मा के तहत किसी भी संगठन के लिए चंदा नहीं लिया जा सकता है और न ही किसी मुद्दे की लड़ाई लड़ी जा सकती है।

