देवघर के बाबा वैद्यनाथ मंदिर के सरदार पंडा के पद पर अजितानंद ओझा की 46 साल बाद ताजपोशी हुई। वह भी न्यायालय के आदेश से। 1970 से सरदार पंडा ओहदे पर बैठने की लड़ाई अदालत में लंबित थी। यों देवघर के सरदार पंडों का दिलचस्प इतिहास रहा है। चूंकि सावन के ठीक पांच रोज पहले ही झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास देवघर आए थे और सरदार पंडा की ताजपोशी का जरूरी फरमान कोर्ट का आदेश आने के बाद दे गए। 9 जुलाई से लेकर 8 अगस्त तक सावन का मेला लगा है और इस दौरान लाखों कावड़ियों का आने जाने का सिलसिला जारी है। 46 साल तक सरदार पंडा की कुर्सी विवादों के घेरे में रही। इस वजह से इस पर गौर करना जरूरी है। सर विलियम डब्ल्यू हंटर ने अपनी पुस्तक एनल्स आफ रूरल बंगाल में लिखा है कि मुस्लिम शासन में मुख्य सेवायत वीरभूम के राजा को निर्धारित लगान दिया करता था और देवघर मंदिर का प्रशासन पूरी तौर पर सेवायत के हाथ में था। जब ब्रिटिश शासन प्रारंभ हुआ तो मंदिर का प्रबंध सरकार ने अपने हाथ में ले लिया और 1787 में सेवायतों और तहसीलदारों का संगठन बनाया। नतीजतन मंदिर की आमदनी में बेतहाशा कमी आई।

दरअसल मुख्य सेवायत ने अपने प्यादों के जरिए मंदिर प्रवेश के पहले ही यात्रियों से चढ़ावा और दक्षिणा वसूलने लगा। नतीजतन 1789 में 50 हजार तीर्थयात्री मंदिर आने के बाबजूद सिर्फ चार हजार 84 रुपए ही आमदनी ही हुई। अगले साल वीरभूम के कलेक्टर किटिंग ने मंदिर की कमाई में इजाफे के लिए 120 सशस्त्र सिपाही और 15 अफसरों को तैनात किया। इससे आय बढ़कर आठ हजार 463 रुपए हो गई। जो 1791 में मंदिर की आमदनी चढ़ावे के अलावा 32 गांव और 108 बीघा भूमि से तकरीबन 25 हजार रुपए सालाना होने लगी। इसी साल से सरकार ने मंदिर की कमाई से अपना हिस्सा लेना छोड़ दिया और मंदिर का प्रबंध मुख्य सेवायत असलन ‘ओझा’ को सौंप दिया। गौरतलब है कि ओझा का पद वंशानुगत होता था, किंतु उसकी बहाली सरकार करती थी। इसके लिए उम्र 40 साल से ज्यादा होनी जरूरी थी। उसे सरकार के साथ एक करारनामा करना पड़ता था कि वह मंदिर की मरम्मत वगैरह भी कराएगा और परंपरागत सभी धार्मिक रस्में अदा करेगा। किंतु इस प्रथा के तहत मंदिर की कुव्यवस्था और बेमरम्मति की शिकायतें अक्सर मिलती रहीं और ओझा पर अपनी ओर अपने रिश्तेदारों की जेबें भरने का आरोप लगा।संथाल परगना ज़िले गजेटियर (1938 ) के मुताबिक मैथिल ब्राह्मणों की एक शाखा के तीन सौ पंडा परिवार देवघर के बाबा वैद्यनाथ मंदिर में तीर्थ यात्रियों को पूजा अर्चना में सहायता कर अपनी आजीविका चलाते हंै।

इनका प्रधान सरदार पंडा कहलाता है जो एक ही परिवार का होता है। 16वीं शताब्दी में मिथिला से आए 12 ब्राह्मणों ने यहां पुरोहित का काम शुरू किया। कुछ समय बाद इन पुरोहितों में एक जूदन झा ने मंदिर के कर्ताधर्ता संन्यासी मुकुंद स्वामी को निकाल बाहर किया। इसकी पुष्टि डा. राजेंद्र लाल मिश्रा की पुस्तक जर्नल आॅफ एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल के प्रथम खंड से होती है।प्रथम सरदार पंडा के बाद दूसरे सरदार पंडा क्रम से रघुनाथ , चिक्कू ओझा, मनु ओझा, वामदेव ओझा, क्षेमकर्ण, सदानंद, चंद्रमोहन ओझा, रत्नपान ओझा, जयनारायण, यदुनंदन, टीकाराम, देवकीनंदन, नारायण दत्त, रामदत्त, आनंद दत्त, परमानंद, सर्वानंद, ईश्वरी नंदन, शैलजानंद ओझा हैं। पर सरदार पंडा पद के लिए आपसी पारिवारिक विवाद भी जब-तब होता रहा। इसके लिए इनलोगों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया। इसकी ताजा मिसाल अजितानंद ओझा की इसी 6 जुलाई को हुई ताजपोशी है। मगर अदालत ने इन्हें वितीय अधिकार नहीं दिया है।आपसी तकरार को टालने के लिए इन्होंने यात्री और यजमान का क्षेत्रवार बंटवारा कर रखा है। इसमें मुख्य क्षेत्र इनकी भाषा में परगना कहलाता है। ये यजमानों की वंशावली भी संभाल कर रखते हैं।