नेताओं को खबरों में बने रहने की बड़ी ललक रहती है। लेकिन ज्यादातर की ललक पूरी नहीं होती है। अपने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसमें अव्वल माने जाते हैं। वे एक मुद्दा खत्म होते ही पहले से दूसरे मुद्दे खोज लेते हैं। इस पर तमाम बहस होती रही कि केवल निजी कारों को सम-विषम पर चलाने का ज्यादा लाभ नहीं होगा। अगर सरकार सही मायने में निजी वाहनों की संख्या कम करना चाहती है तो सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को बेहतर करे। लोगों की बातों को अनसुनी कर केजरीवाल अपनी सम-विषम योजना जारी रखे हुए हैं। अन्य विवादों की तरह यह विवाद भी अदालत में पहुंच गया है। अभी यह मुद्दा खत्म हुआ ही नहीं कि उन्होंने निजी स्कूलों में मैनेजमेंट कोटा खत्म करने की घोषणा कर दी। पिछले साल राष्ट्रपति शासन में उप राज्यपाल ने यह फैसला किया था लेकिन स्कूल मालिक हाई कोर्ट चले गए, जहां से उन्हें स्थगन आदेश मिल गया। मामला अभी अदालत में है, ऐसे में सरकार कैसे फैसला ले सकती है यह बात भले ही किसी और के समझ में न आए लेकिन केजरीवाल और उनकी टीम के लोगों को समझ में आ गई है और इसे वे दोहराते रहेंगे।
झगड़ा ज्यादा
इमरजंसी के दिनों में एक नारा चर्चित हुआ था-बातें कम, काम ज्यादा। दिल्ली में आम आदमी पार्टी(आप) की सरकार बनने के बाद एक दूसरा नारा चर्चित हुआ है काम कम, झगड़ा ज्यादा। सरकार चाहे जो दावा करे ,साल भर से अनेक विकास कार्य बंद पड़े हैं। जो काम दिल्ली सरकार के अधीन नहीं है, वही सरकार करेगी और उसकी केंद्र शासित प्रदेश होने के चलते केंद्र सरकार से मंजूरी न मिलने पर उसे न मानने की जिद अड़ी रहेगी। ताजा विवाद डीडीसीए घोटाले पर बने दिल्ली सरकार के आयोग का है। केंद्र सरकार ने उसे नियम विरूद्ध मान कर खत्म कर दिया लेकिन सरकार कह रही है कि आयोग अपना काम करेगी। केजरीवाल और उनके समर्थक नेता कहते हैं कि शीला दीक्षित सरकार ने भी आयोग बनाए। उन्हें पता नहीं है कि दीक्षित ने ही नहीं भाजपा सरकार के दिनों में भी मदनलाल खुराना ने आयोग बनाए लेकिन तब के उप राज्यपालों के माध्यम से केंद्र सरकार से मंजूरी लेकर। यह सरकार किसी की मंजूरी लेने को तैयार नहीं है और पूर्ण राज्य की तरह फैसला ले रही है। फरवरी में सरकार बनी और तब से पता नहीं कितने मुद्दे पर उनकी उप राज्यपाल और केंद्र सरकार से लड़ाई हो चुकी है। लेकिन यह लड़ाई विकास कार्यों के लिए नहीं हो रही है। पता नहीं इन विवादों का कब तक अंत होगा।
फरमान का क्या
फरमान देने और उसे लागू करने में बड़ा फर्क होता है। कई फरमान ऐसे होते हैं जब उसे लागू करने वाले चले भी जाएं पर उसे सौ फीसद लागू करना मुशिक्ल होती है। ऐसा ही एक फरमान मौजूदा पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी ने जारी किया है। फरमान यह है कि कोई भी पुलिस अधिकारी निजी गाड़ियों में पुलिस का लोगों नहीं लगाएगा। पकड़े जाने पर उन्हें दंडित किया जाएगा। यह फरमान तब जारी हुआ, जब एक फर्जी एसीपी का आयुक्त का आमना-सामना हो गया। बताया जा रहा है कि अपनी चमचमाती महंगी गाड़ियों पर पुलिस लिखाने वाले व्यक्ति को तब पता नहीं था कि जिससे वह पंगा ले रहा है वह दिल्ली पुलिस का आयुक्त ही है। एसीपी जैसे अधिकारी बताकर पुलिसिया रौब दिखाकर उसने सोचा होगा कि कोई इंस्पेक्टर समान पुलिसवाला होगा जो उसकी धौंस में आ जाएगा पर हुआ उल्टा। अब आयुक्त बस्सी ने यह फरमान तो जारी कर दिया कि पुलिस का लोगो कोई निजी गाड़ियों में इस्तेमाल नहीं कर सकता पर इस पर कितना अमल हो पाता है यह तो बस्सी के रहते और उनके दो महीने बाद जाने के बाद ही पता चलेगा।
वेतन नहीं मिलने पर
निगमों का हाल बेहाल हुआ पड़ा है। बजट सत्र चल रहा है और अधिकारी नहीं दिख रहे हैं। पता चला कि जिन्हें वेतन नहीं मिल रहा, वे काम पर अपने मन मुताबिक आते हैं और जाते हैं। आला अधिकारी उन्हें किस मुंह से कहें कि दफ्तर में नियमानुसार आना चाहिए। बेदिल को पूर्वी दिल्ली में एक इंजीनियर ने बताया कि वे अब निजी काम में व्यस्त रहते हैं। बेदिल ने जब पूछा कि निजी काम से क्या अभिप्राय है, तो उन्होंने कहा कि दरअसल निगम में समय पर वेतन नहीं मिलने से उनके आला अधिकारी कुछ सुस्ती बरते हुए हैं। इसलिए घर के खर्चे के लिए वे दूसरी जगहों पर काम कर रहे हैं।
महंगा पड़ा
यूपी नंबर की गाड़ी पर दिल्ली पुलिस लिखवाना और पुलिस आयुक्त की गाड़ी के बराबर चलना एक जालसाज शख्स को महंगा पड़ा। उसकी पोल खुल गई और फर्जीवाड़े में उसे जेल की हवा खानी पड़ी। जांच में फर्जी एसीपी बताने वाले इस शख्स को गिरफ्तार किया गया। हुआ यों कि पुलिस आयुक्त बस्सी लौट रहे थे, रास्ते में उन्हें एक एसयूवी नजर आई। उस पर दिल्ली पुलिस का स्टीकर लगा था। गाड़ी एक महिला चला रही थी। गाड़ी का नंबर यूपी का था। इस बाबत पूछताछ में विवेकानंद शर्मा नाम के आरोपी शख्स पुलिस को यही बताता रहा कि वह विजिलेंस में एसीपी है। पुलिस ने जब गाड़ी को सड़क पर देखा तो शक हुआ, क्योंकि दिल्ली पुलिस का स्टीकर लगी गाड़ी का नंबर यूपी का था। जांच में शक सही निकला और आरोपी को पकड़ा गया।
तू डाल-डाल…
दिल्ली विश्वविद्यालय में राम मंदिर के मुद्दे पर आमने-सामने आए परिषद और एनएसयूआइ की प्रदर्शन कीतैयारियों में तू डाल-डाल तो मैं पात-पात वाली कहावत चरितार्थ होती दिखी। सुबह से विरोधी ही हावी थे। कैंपस को भगवामुक्त करने के नारे जोर-जोर से लगाए जा रहे थे। उनकी संख्या भी तब अधिक थी। कई संगठन जो एक साथ थे। लेकिन जैसे ही सेमिनार शुरू हुआ, परिषद की तय रणनीति सामने आई। चारो ओर से केसरिया झंडा लहराते लोग आने लगे। एनएसयूआइ के विरोध के खिलाफ एबीवीपी के कार्यकर्ता मानों शिव सैनिक हो गए। ‘जय श्रीराम’ और ‘अयोध्या तो झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है’ सरीखे नारों से कैंपस गूंज गया। मानो सब पहले से तय था। एक अन्य की प्रतिक्रिया थी-वे डाल डाल, तो ये पात पात ।
-बेदिल
दिल्ली मेरी दिल्ली- खबरों में रहना
नेताओं को खबरों में बने रहने की बड़ी ललक रहती है। लेकिन ज्यादातर की ललक पूरी नहीं होती है। अपने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसमें अव्वल माने जाते हैं।
Written by जनसत्ता
नई दिल्ली

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First published on: 11-01-2016 at 03:44 IST