दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार (8 जुलाई) की वह अर्जी खारिज कर दी जिसमें केंद्र की वह अधिसूचना रद्द करने की मांग की गई थी। उस अधिसूचना के तहत सुबह छह बजे से रात 10 बजे तक कंडोम के विज्ञापनों के प्रसारण पर पाबंदी लगाई गई है। न्यायालय ने कहा कि वह ‘सरकार के सोचे-समझे नीतिगत निर्णय’ में दखल नहीं करने जा रहा। दिल्ली उच्च न्यायालय की तरफ से यह भी कहा कि इससे फिलहाल किसी कानून का उल्लंघन होता नहीं दिख रहा। ऐसे में अधिसूचना को लेकर कुछ भी कहने की जरूरत महसूस नहीं होती।

कोर्ट ने की यह टिप्पणीः मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ ने कहा कि अदालत ‘सरकार की किसी नीति में दखल देने के मामले में तब तक बहुत ही धीमी रहेगी’ जब तक इससे संविधान या किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता हो। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर उसके पास कोई ‘विशेषज्ञ वाली जानकारी नहीं है’ और सरकार के फैसले से ‘संविधान या किसी प्रभावी कानून का कोई उल्लंघन नहीं हो रहा।’

दो साल पहले जारी हुई थी अधिसूचनाः पीठ ने कहा, ‘यह सरकार का सोचा-समझा नीतिगत निर्णय है। हमें इसमें दखल की कोई वजह नजर नहीं आती।’ न्यायालय ने सरिता बरपांडा की वह याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की जिसमें 11 दिसंबर 2017 को केंद्र की ओर से जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। अधिसूचना के तहत सरकार ने सुबह छह बजे से रात 10 बजे तक के लिए कंडोम के विज्ञापनों के प्रसारण पर पाबंदी लगा दी थी।