दिल्ली पर अधिकारों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले से दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार के हौसले तो बुलंद हुए लेकिन दिल्ली बनाम केंद्र सरकार की लड़ाई कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। तीन दिन पहले आइटीओ पर बने स्काईवॉक और फुटओवर ब्रिज और दो दिन पहले रानी झांसी रोड पर बने फ्लाईओवर के उद्घाटन में दिल्ली सरकार के नुमाइंदे को न शामिल किए जाने का मुद्दा केजरीवाल से लेकर उनकी पार्टी लगातार उठा रही है। वहीं, दिल्ली सरकार की ओर से मेट्रो के चौथे चरण की मंजूरी का मामला लगातार टालने का मुद्दा भाजपा के नेता उठा रहे हैं। टकराव का यह सिलसिला तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनने से ही चल रहा है लेकिन माना जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद हालात बदलेंगे। सुप्रीम कोर्ट में अभी दिल्ली में तैनात आला अधिकारियों पर नियंत्रण के मामले पर सुनवाई चल रही है। दिल्ली का अपना कैडर न होने से अभी तक यहां की अफसरशाही दिल्ली के उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन उसी तरह से काम करती है जिस तरह से बाकी केंद्र शासित राज्यों में करती है।
दिल्ली अभी भी तकनीकी रूप से केंद्र शासित राज्य है और इसको पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की याचिका को सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है। एक बार केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार 2003 में शहर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का विधेयक संसद में लाई थी। उसमें भी नई दिल्ली के वीआइपी इलाके को अलग रखने से लेकर कई किंतु-परंतु थे लेकिन वह भी प्रवर समिति को भेजा गया, तब तक सरकार ही चली गई। अब भाजपा का एजंडा दिल्ली के बारे में बदल गया। दिल्ली में बहुशासन प्रणाली है। दिल्ली विधानसभा और दिल्ली नगर निगमों की तो पूरी दिल्ली में कमोबेश समानंतर सत्ता है। दिल्ली के सभी महत्त्वपूर्ण इलाके की जमीन केंद्र सरकार से नियंत्रित दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के पास है। दिल्ली पुलिस पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है। नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) और दिल्ली छावनी बोर्ड में दिल्ली के चुने हुए प्रतिनिधियों का नाम मात्र का दखल है। निगम और केंद्र में भाजपा और विधानसभा में ‘आप’ काबिज है। ऐसा स्थिति पहली बार नहीं हुई है, बार-बार होती रही है।
शहर की सभी बड़ी सड़कें दिल्ली सरकार के पास हैं लेकिन ज्यादातर छोटी और मोहल्ले की सड़कें नगर निगम के पास हैं। पार्किंग व गृहकर नगर निगम के पास है तो परिवहन विभाग दिल्ली सरकार के पास। 1996 में दिल्ली मेट्रो की नींव पड़ते समय ही तय हुआ कि उसमें दिल्ली और केंद्र सरकार बराबर के भागीदार होंगे। तभी दिल्ली सरकार प्रबंध निदेशक तय करता है और केंद्र सरकार अध्यक्ष। विवाद पहले भी होते रहे लेकिन उसका समाधान बैठकों में निकलता था, सार्वजनिक बयानबाजी से नहीं। मेट्रो की शुरुआत दिल्ली की भाजपा सरकार ने की और 1998 में शाहदरा से तीस हजारी के पहले खंड के उद्घाटन के समय दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बन गई। 15 साल कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहीं लेकिन मेट्रो का काम समय से पूरा होता गया। किराया तय करने में दिल्ली सरकार को भरपूर महत्त्व न देने का आरोप लगाकर केजरीवाल सरकार चौथे चरण की फाइल रोके हुई है। केंद्र सरकार का आरोप है कि किराया बढ़ोत्तरी की बैठक में दिल्ली सरकार के अधिकारी नियमित आते रहे और घाटे को देखते हुए इसका समर्थन करते रहे। विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने बताया कि दिल्ली सरकार मेट्रो के चौथे चरण की स्वीकृति की फाइलों को अक्तूबर 2014 से, अतिरिक्त मेट्रो कोच खरीदने की फाइल जून 2016 से तथा दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) की फाइल दिसंबर 2016 से रोके हुए है।
दिल्ली सरकार के कहने पर दिल्ली मेट्रो ने जून 2016 में 916 मेट्रो कोच खरीदने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भेजी थी। परंतु दिल्ली सरकार ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। दिल्ली मेट्रो ने खरीदे जाने वाले कोचों की संख्या कम करके जनवरी 2017 में 582 कोचों की खरीद का दोबारा प्रस्ताव भेजा। यह प्रस्ताव भी दिल्ली सरकार के पास लंबित पड़ा रहा। केजरीवाल ने 14 मार्च 2018 को मेट्रो की पिंक लाइन के उद्घाटन पर अपनी प्रतिबद्धता जताई थी कि इससे संबंधित स्वीकृति मार्च 2018 तक दे दी जाएगी। परंतु स्थिति जस की तस बनी रही। यही हाल दिल्ली और मेरठ के बीच बनने वाली आरआरटीएस की स्वीकृति को लेकर है। इस संबंध में उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को 9 दिसंबर 2016 को प्रस्ताव भेजे गए थे। इस परियोजना के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी स्वीकृति मई 2017 में ही दे दी थी परंतु दिल्ली सरकार ने अपनी स्वीकृति नहीं दी है।

