बिहार और वहां की शिक्षा व्यवस्था की प्रतीक बन चुकी खिड़की पर चढ़कर नकल कराने की तस्वीर और 12वीं की परीक्षा के “टॉपर” की खबर तो आपको याद ही होगी आइए आज हम आपको बताते हैं बिहार शिक्षा विभाग में हुए करीब एक दशक पुराने लेकिन अलबेले मामले के बारे में, जब अदालत में इंसाफ मांगने गए टीचरों के मामले पर सुनवाई के चलते टीचरों की नियुक्ति का एक बड़ा घोटाला सामने आ गया। लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र जैसे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों का नाम जुड़ा होने के बावजूद इस मामले की ज्यादा चर्चा नहीं होती है जबकि करीब दो दशकों इससे जुड़े मामलों पर हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है।

गुरुवार (15 दिसंबर) को मुकदमे में सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने राज्य के शिक्षा विभाग को फटकार लगाते हुए कहा कि बिहार में शिक्षा विभाग अपने कामकाज को लेकर हमेशा चर्चा में रहा है। एक ऐसा समय भी रहा जब शिक्षा अधिकारी अपने झोले में नोट और दूसरे में अपना अप्वाइंटमेंट लेटर भी लेकर घूमा करते थे। इस मामले में अगली सुनवार्इ चार हफ्ते बाद होगी।

ये मामला शुरू हुआ 1991 में जब बिहार निम्न अवर सेवा, लोअर सबार्डिनेट एजुकेशन सर्विस के 159 शिक्षकों को नौ जुलाई 1991 को अलग-अलग तारीखों पर पिछली तारीख से अवर शिक्षा सेवा में प्रमोट किया गया था लेकिन वित्तीय लाभ वित्त विभाग की सहमति के बाद मिलने की बात कही गई थी।  जब वित्तीय लाभ मिलने में इन टीचरों को देरी हुई तो वो 1997 में हाई कोर्ट पहुंच गए। मामले की सुनवाई के दौरान बिहार सेकेंडरी एजुकेशन के निदेशक ने कोर्ट से कहा कि 1980 के बाद बिहार में महिला टीचरों की नियुक्ति अनियमित है और इसीलिए प्रमोशन भी अनियमित है। हाई कोर्ट ने 18 दिसंबर 1998 को पूरे मामले को सीबीआई को सौंप दिया।

2004 में सीबीआई ने शिक्षा विभाग को एक रिपोर्ट भेजी जिसके आधार पर मामला 1980 से 1998 के बीच नियुक्त  247 शिक्षकों से स्पष्टीकरण मांगा गया। लेकिन स्पष्टीकरण में संतोषजनक जवाब न मिलने पर विभाग ने फर्जी शिक्षकों की सेवा समाप्त कर दी। हालांकि नौकरी से बरख्सात किए गए टीचर शिक्षा विभाग के फैसले के खिलाफ दोबारा अदालत गए। इस मामले पर सुनवाई अभी जारी है। हाईकोर्ट का कहना है कि इस मामले में सारे सबूत देखने के बाद ही कोर्ट यह तय करेगी की सीबीआई रिपोर्ट के आधार पर इन शिक्षकों को उनके पद से हटाना ठीक था या नहीं।

गुरुवार को कोर्ट ने इस बात के लिए शिक्षक विभाग को फटकार भी लगाई की सरकारी वकील को सुनवाई वाले दिन ही सारे सबूत क्यों सौंपे जाते हैं। कई मामलों में ऐसा ही होता है। अगली तारीख के पहले हलफनामा निश्चित रूप से दायर हो जाना चाहिए ताकि सुनवार्इ पूरी हो सके।

वहीं इस मामले में बर्खास्तगी आदेश को कोर्ट में चुनौती देने वाली शिक्षिका के वकील का कहना कि शिक्षा विभाग ने सिर्फ सीबीआई रिपोर्ट के आधार पर रद्द कर दी। जबकि वह पिछले 30 सालों तक शिक्षिका के पद पर काम कर चुकी हैं। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में सीएम से लेकर सांसदों की सिफारिशों पर नियम को ताक पर रखते हुए नियुक्तियां की गई। टीचरों की नियुक्ति करने की सिफारिश करने वालों में लालू प्रसाद यादव, जगन्नाथ मिश्र, तारिक अनवर नागेन्द्र झा और सीपी ठाकुर जैसे नेताओं का नाम शामिल है।