बिहार में नीतीश कुमार सुशासन की सरकार होने का दावा करते हैं और महादलितों-महापिछड़ों की नुमाइंदगी की भी बात करते हैं मगर उनके ही शासनकाल में महादलितों को मंदिर में घुसने नहीं दिया जा रहा है। वाकया भागलपुर का है। भागलपुर जिले के एक गांव में उस समय तनाव बढ़ गया, जब दर्जनभर महादलित महिलाओं को मंदिर में घुसने से रोक दिया गया। इन महिलाओं को शुक्रवार को 200 साल पुराने काली मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया, जिसके बाद इन महिलाओं ने प्रशासन के समक्ष एक लिखित शिकायत दर्ज कराई और उनसे मामले में हस्तक्षेप करते हुए न्याय दिलाने की मांग की।
भागलपुर के दास टोला निवासी मंगिनी देवी ने कहा, “हम जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस महानिरीक्षक व पुलिस उपमहानिरीक्षक के समक्ष इस घटना के संबंध में और दलित महिलाओं के लिए मंदिर के कपाट खुलवाने में स्थानीय पुलिस की नाकामी को लेकर लिखित शिकायत दर्ज कराएंगे।”
पुलिस थाने के प्रभारी राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि स्थानीय पुलिस द्वारा मंदिर के कपाट बार-बार खुलवाने के प्रयास के बावजूद मंदिर के कपाट शुक्रवार देर रात तक बंद रहे। मंगिनी ने कहा कि दलित महिलाओं को मंदिर के बाहर से ही प्रार्थना करने पर दबाव बनाया गया, लेकिन महिलाओं ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
बता दें कि साल 2005 में बिहार की सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने राज्य भर के महादलितों और अतिपिछड़ों को एकजुट करने का काम किया था। उन्होंने महादलित आयोग का बा गठन किया था, ताकि उन्हें वाजिव हक दिया जा सके। तब उन्हें महादलितों का मसीहा कहा जाता था। बाद में जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने तक उनकी यह छवि बेदाग रही लेकिन मांझी को सीएम पद से हटाने के बाद महादलितों के बीच उनकी छवि को लेकर शंका पैदा होने लगा। हालांकि, नीतीश कुमार अपनी सरकारी योजनाओं में दलितों और महादलितों को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात करते रहे हैं।
