बिहार के मधुबनी की एक महिला वकील ने कोर्ट में कार को ही अपना केबिन बना रखा है। मधुबनी जिला न्यायालय में पिछले 13 सालों से वकील अनीता झा ने कार की पिछली सीट से अपना काम चलाया है। अनीता की टाटा टियागो कार ही उनका ऑफिस है। क्लाइंट आते-जाते रहते हैं और मौसम बदलता रहता है। अदालत की पार्किंग में सालों से एक चीज नहीं बदली है और वह है अनीता की जिला न्यायालय के हर वर्किंग डे पर कार से आने और उसकी पिछली सीट से ही अपना काम करने की आदत।

सुबह 10 से 11 बजे से लेकर शाम लगभग 5 बजे तक, टाटा टियागो कार मधुबनी के जलधारी चौक इलाके में स्थित अदालत परिसर में महिला वकील का कैबिन है, जहां वह याचिकाएं तैयार करती हैं, ग्राहकों को सलाह देती हैं और कानूनी रणनीतियां बनाती हैं।

‘अदालत में किसी महिला वकील को कोई कक्ष आवंटित नहीं किया गया’

वकीलों की यूनिफॉर्म पहने अनीता ने अपना दर्द साझा करते हुए इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “इतने बड़े न्यायालय में मेरे 28 सालों की वकालत के दौरान, मुझे या किसी अन्य महिला वकील को कोई कक्ष आवंटित नहीं किया गया।” वकील ने 1 मार्च 2013 के उस दिन को याद किया जब उन्होंने अदालत परिसर के निर्माण के बाद उसमें महिला वकीलों के लिए एक कक्ष बनाने की मांग की थी लेकिन उनके पुरुष सहकर्मियों ने उन्हें अपमानित किया था।

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अनीता याद करती हैं, “जिला अदालत में महिला वकीलों के लिए एक साझा स्थान का उद्घाटन हुए 13 साल हो गए हैं। हालांकि, कुछ ही दिनों बाद, इसे महिला कक्ष के रूप में दर्शाने वाला चिन्ह हटा दिया गया और उसके स्थान पर अन्य पुरुष वरिष्ठों के नाम लगा दिए गए।” 2013 में, अनीता और 10-12 महिला वकीलों को पता चला कि महिला चैंबर का चिन्ह हटाकर उसकी जगह एक पुरुष वकील का नाम लगा दिया गया है। जिसके बाद उन्होंने अपनी शिकायतें स्थानीय बार एसोसिएशन के सचिव और अध्यक्ष के सामने रखीं और उनसे पूछा कि आपने क्या किया है? अब हमें कहाँ बैठना चाहिए? उन लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

अनीता का दावा है कि उन्हें ताना मारते हुए कहा गया कि वह अदालत में जमीन चाहती हैं

अनीता ने 2011 में अनुरोध किया था कि महिला वकीलों के लिए एक कक्ष होना चाहिए क्योंकि वे सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक अदालत कक्ष में लगातार काम करती हैं। एक साल पहले, अनीता ने महिलाओं के चैंबर के लिए लगभग 15 लाख रुपये एकत्र किए थे जो उन्हें कभी आवंटित नहीं किए गए थे। अनीता का दावा है कि पुरुषों के गढ़ में उन्हें ताना मारते हुए कहा गया कि वह यहां जमीन चाहती हैं।

अनीता ने अपमान को सहन किया और बार-बार अदालत जाती रही। उन्होंने बताया, “आखिरकार, मैंने एक मेज और कुर्सी के साथ एक छोटा सा कार्यालय बनाने का फैसला किया लेकिन कुछ ही दिनों में वे भी मुझसे छीन लिए गए। उन्होंने एक उपयुक्त कक्ष की मेरी इच्छा का मज़ाक उड़ाया और इसे मानसिक विक्षिप्तता का संकेत बताकर खारिज कर दिया। माहौल ज़हरीला हो गया और पीठ पीछे दी जाने वाली गालियां खुलेआम, आमने-सामने दी जाने लगीं। यह सब देश की न्याय व्यवस्था के केंद्र में दिन दहाड़े हुआ।”

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अनीता ने शुरू की कार में प्रैक्टिस

अनीता ने आगे बताया, “फरवरी और मार्च 2013 में महाकुंभ मेले के दौरान वह गंगा के पवित्र जल में खड़ी थीं तभी उनके मन में एक ही विचार आया कि मुझे मधुबनी छोड़ना होगा। हालांकि, बाद में उन्हें समझ आया कि भाग जाना समाधान नहीं था। अगर मुझे सफल होना है तो मुझे यहीं पर यह करना होगा। मैं आखिर जाऊंगी कहां?”

अपनी कार में प्रैक्टिस शुरू करने का अनीता का निर्णय न केवल अवज्ञा का प्रतीक था बल्कि विपरीत लिंग के लोगों द्वारा किए गए उत्पीड़न के खिलाफ एक विरोध भी था। 13 साल बाद भी अनीता नियमित रूप से काम पर आती हैं, कार में अपने क्लाइंट्स से मिलती हैं और सुनवाई के लिए तैयार होती हैं। अनीता का कहना है कि कार रूपी यह चैंबर उनके प्रतिरोध का प्रतीक है।