देशभर के केंद्रीय, राज्य और मानद विश्वविद्यालयों के अलावा, सहायता प्राप्त और अनुदान प्राप्त विश्वविद्यालयों से संबद्ध महाविद्यालयों में चल रही सहायक प्रोफेसर के पदों पर स्थायी नियुक्ति प्रक्रिया एक बार फिर से टल गई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के संयुक्त सचिव की ओर से सभी विश्वविद्यालयों को भेजे गए पत्र में आरक्षण नीति का अनुपालन करने को कहा गया है। उन्होंने यह निर्देश हाल ही में मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की ओर से जारी आदेश को स्वीकार करते हुए दिया है। पत्र के आने के बाद विश्वविद्यालय के विभागों/कॉलेजों को रोस्टर फिर से बनाना होगा। यह रोस्टर पहले कॉलेज को एक इकाई मानकर वरिष्ठता के आधार पर 200 अंक पर आधारित रोस्टर बनाया गया था जिसे अब विभाग और विषयवार बनाया जाएगा। इस रोस्टर से सबसे ज्यादा नुकसान एससी/एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों को होगा।
डीयू की विद्वत परिषद (एससी) के सदस्य प्रोफेसर हंसराज सुमन ने बताया है कि यूजीसी के पत्र के आधार पर विश्वविद्यालयों के विभागों और संबद्ध कॉलेजों को फिर से नया रोस्टर तैयार करना होगा। पहले कॉलेजों और विभागों ने रोस्टर को कॉलेज को एक इकाई मानकर वरिष्ठता और 200 अंकों के आधार पर रोस्टर बनाया था। इसी आधार पर कॉलेजों ने सहायक प्रोफेसर के विज्ञापन निकाले थे जिसके आधार पर कॉलेजों में विषयवार स्क्रीनिंग भी हो चुकी है। इस पत्र के बाद अब कॉलेजों को नया रोस्टर तैयार करके डीयू से पास कराकर पदों को फिर से विज्ञापित कराना होगा। उन्होंने बताया कि इससे सबसे अधिक नुकसान आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों को होगा। उनके मुताबिक जहां छोटे विभाग है और पदों की संख्या 4 या 6, वहां कभी भी एससी की पोस्ट बनेगी ही नहीं। इससे एससी, एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों पर खतरा मंडरा रहा है।
नए आदेश से आरक्षित वर्गों के शिक्षकों में रोष व्याप्त है क्योंकि इसके कारण उनकी सीटें कम हो जाएंगी। वर्तमान में कॉलेजों में 4500 शिक्षक पदों में से 2500 पद एससी, एसटी और ओबीसी कोटे के हैं लेकिन अब नया रोस्टर बना तो आरक्षण कभी पूरा नहीं होगा। दिल्ली विश्वविद्यालय एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स फोरम की ओर से बुलाई गई आपात बैठक में शिक्षकों ने यूजीसी के द्वारा भेजे गए पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रोष प्रकट किया।

