रिजवान निजामुद्दीन अंसारी

भारत का एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम दुनिया में कुपोषण मिटाने का सबसे बड़ा कार्यक्रम है। पर कुपोषण का ऊंचा ग्राफ इस योजना की नाकामी ही बयान करता है। जहां करीब आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हों, वहां देश की भावी तस्वीर कैसी होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। पर हमारे नीति नियंताओं की इसकी फिक्र नहीं है, क्योंकि उनकी प्राथमिकताएं दूसरी हैं।

पहले श्योपुर फिर उज्जैन और अब अगला कौन? यह प्रश्न मध्यप्रदेश के वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक हो गया है। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा उज्जैन में 724 कुपोषित बच्चों की रिपोर्टिंग होने से मध्यप्रदेश में कुपोषण एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। उज्जैन और श्योपुर के अतिरिक्त बालाघाट, बैतूल, बुरहानपुर समेत कई जिलों के कुपोषण की चपेट में आ जाने से मध्यप्रदेश के संदर्भ में कुपोषण पर व्यापक विमर्श आवश्यक हो गया है। उज्जैन में ‘दस्तक अभियान’ के माध्यम से मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने तराना तहसील में 465 और खाचरौद में 194 बच्चों के कुपोषित होने की सूचना दी है, जिससे राज्य सरकार की ढेरों योजनाओं पर सवालिया निशान लग गया है। इनमें से सवा सौ से ज्यादा बच्चों को गंभीर हालत में अस्पतालों में भर्ती भी कराया गया है और दो की कुपोषण से मौत होने की पुष्टि भी हुई है। हालांकि मीडिया में आई खबरों के मुताबिक कुपोषण की भेंट चढ़ जाने वाले बच्चों की तादाद इससे ज्यादा हो सकती है। आंकड़े की सच्चाई जो भी हो, लेकिन कुपोषण के मामले में पूरे प्रदेश का कमोबेश यही सूरत-ए-हाल है और इस पर काबू पाने में प्रशासन को खासी मशक्कत करनी पड़ यही है।

पर मध्यप्रदेश अपवाद नहीं है, वह भारत में कुपोषण की व्यापकता का उदाहरण भर है। गौरतलब है कि 2016 के ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ में भारत को 118 देशों में 97वां स्थान दिया गया है और इस मामले में भारत की स्थिति पड़ोसी देशों- नेपाल, श्रीलंका व बांग्लादेश- से भी खराब बताई गई है। पिछले वर्ष जहां भारत के सूचकांक का मान 29 था वहीं इस वर्ष मामूली अंतर के साथ 28.5 रहा। लिहाजा, भारत को भूख की गंभीर स्थिति वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। यह इस बात का द्योतक है कि भारत में सत्ता तो परिवर्तित होती रही लेकिन भुखमरी और कुपोषण के स्तर में सुधार के बजाय स्थिति बदतर ही होती चली गई। नतीजतन उज्जैन, श्योपुर और पालघर जैसे वाकये देखने को मिल रहे हैं।
वर्तमान संदर्भ में कुपोषण सिर्फ भारत नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। विश्व बैंक ने इसकी तुलना ‘ब्लैक डेथ’ से की है जिसने अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) के अनुसार, विश्व की 11.5 फीसद आबादी को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है। विकासशील देशों की स्थिति और भी खराब है। इन देशों की 12.9 फीसद आबादी पर्याप्त पोषण से वंचित है। वैश्विक स्तर की बात करें तो कुपोषण अब भी विश्व समुदाय के लिए नासूर बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 84 करोड़ लोग अब भी कुपोषण का दंश झेलने को मजबूर हैं। मध्य अफ्रीकी गणराज्य, चाड, जाम्बिया समेत सात देश ऐसे हैं जहां भूख की स्थिति को बहुत खतरनाक बताया गया है। इन देशों में यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम कुपोषण-उन्मूलन के लिए लगातार काम कर रही है लेकिन काफी मशक्कत के बाद भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है। दरअसल, इन देशों में कुपोषण की समस्या काफी पुरानी है। लंबे समय से इन देशों के बच्चे पोषणयुक्त भोजन से वंचित रहे हैं। इसका कारण सीधे तौर पर इनकी गरीबी से जुड़ता है। इन देशों की प्रतिव्यक्ति आय काफी कम है।

फिर भारत की ओर रुख करें। विश्व के चालीस फीसद कुपोषित बच्चे भारतीय हैं। यहां हर वर्ष पच्चीस लाख बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में शुमार भारत में कुपोषण की दर लगभग 55 फीसद है जबकि उप-सहारीय अफ्रीका में यह सत्ताईस फीसद है। अत: यह आंकड़ा हमारी सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े करता है। यों हम खाद्यान्न व दुग्ध उत्पादन में शिखर पर हैं, लेकिन यहां विश्व के पच्चीस फीसद भूखे लोग भी निवास करते हैं, जो दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का महज 1.2 फीसद खर्च करती है जो दुनिया भर के देशों में सबसे कम है, यहां तक कि अफ्रीका के उप-सहारीय क्षेत्रों में भी यह फीसद 1.7 है।

इसके बरक्स विश्व के सत्ताईस प्रतिशत कुपोषित लोग भारत में रहते हैं। अब भी भारत की आबादी का एक तिहाई हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को विवश है। कुपोषण की ऐसी व्यापक मौजूदगी के लिए कई कारक जिम्मेवार हैं। मसलन, पोषण कार्यक्रमों का उचित क्रियान्वयन न होना, हमारी सरकारें द्वारा गरीबी और बेरोजगारी की समस्याओं का संजीदगी से संज्ञान न लेना, मनरेगा जैसे सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार, आदि। इसके अलावा, हर साल पांच करोड़ टन अनाज गोदामों में रखे-रखे सड़ जाता है, लेकिन जरूरतमंदों को नसीब नहीं हो पाता। सर्वोच्च न्यायालय ने अनाज सड़ने की खबरों का संज्ञान लेते हुए एक दफा पूछा था कि आप इसे गरीबों में मुफ्त क्यों नहीं बांट देते? पर सरकार इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। सवाल है कि आखिर हमारी सरकार इन जरूरतमंदों के प्रति इतना उदासीन और निष्क्रिय क्यों है? प्रक्रियाओं को इतना सुलभ क्यों नहीं बनाया जाता कि गरीबों तक अनाज आसानी से पहुंच सके? फिर यहां पर एक बड़ा प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि कुपोषण की भयावह होती तस्वीर के लिए आखिर जिम्मेवार कौन है?
कुपोषण की इस भयावह तस्वीर को बदलने के लिए संजीदगी से कोशिश करने की जरूरत है। मसलन, आइसीडीएस (पोषण), पीडीएस (आहार), मनरेगा (रोजगार) आदि योजनाओं के उचित क्रियान्वयन की आवश्यकता है। दरअसल, हमें यह भी समझना होगा कि कुपोषण एक जटिल समस्या है और इसका सीधा संबंध कुपोषित बच्चों के परिवारों की आजीविका से भी है। जब तक गरीब परिवारों के पास स्वास्थ्यप्रद निर्वाह लायक आजीविका न हो, कुपोषण को मिटाना नामुमकिन है। लिहाजा, कुपोषण की पहचान वाले परिवारों को जनवितरण प्रणाली तथा मनरेगा के तहत सामाजिक सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए। पोषण पुनर्वास केंद्रों तथा स्वास्थ्य केंद्रों में उपयुक्त उपकरण व पर्याप्त संख्या में बेड का प्रबंध करना आवश्यक है। साथ ही बाल विशेषज्ञों की उचित तैनाती पर भी जोर होना चाहिए।

इससे इतर देखें तो श्रम आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश की बेरोजगारी दर पांच साल के उच्च स्तर पर है, लिहाजा सरकार को रोगजार सृजन के लिए विशेष पहल करने की जरूरत है। इससे प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि हो सकेगी, जिससे जीवन-स्तर में सुधार होगा। शिक्षा की दशा सुधारने की जरूरत है ताकि बाल विवाह को रोक कर बच्चों को कुपोषित होने से बचाया जा सके। इसके लिए शिक्षकों की पर्याप्त तैनाती की जरूरत है, क्योंकि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान देश भर में हजारों बिना शिक्षक वाले विद्यालयों की बात सामने आई है। बहरहाल, सरकार और समाज को दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी, नहीं तो इन मासूमों की पुकार सरकार के खोखले दावों और नारों में दब कर रह जाएगी। स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया के जो सपने करोड़ों भारतवासियों को दिखाए गए हैं, क्या वे ऐसी विषम परिस्थितियों में साकार हो सकेंगे? यों भारत का एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम दुनिया में कुपोषण मिटाने का सबसे बड़ा कार्यक्रम है। लेकिन भारत में कुपोषण का ऊंचा ग्राफ इस योजना की नाकामी ही बयान करता है। जहां करीब आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हों, वहां देश की भावी तस्वीर कैसी होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। पर लगता है हमारे नीति नियंताओं की इसकी फिक्र नहीं है, क्योंकि उनकी प्राथमिकताएं दूसरी हैं।