आश्चर्य, भारत को सिंधू, साक्षी और कर्मकार के रूप में जेंडर चैंपियन तो मिल गर्इं, रियो में अन्य महिला भागीदारों की आंखों में तैरते सफलता के सपनों की कशिश भी देश ने शिद््दत से महसूस की, हालांकि तब भी जेंडर बजट का मुद््दा हमारी चर्चा से नदारद है। बेशक, ओलंपिक बाद के तमाम विश्लेषणों के केंद्र में खिलाड़ियों की तैयारी पर होने वाले खर्च का आंकड़ा जरूर उद्धृत हो रहा है। ओलंपिक के दौरान ही पटियाला में राष्ट्रीय स्तर की हैंडबॉल की एक लड़की ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे कॉलेज के छात्रावास में रहने की जगह नहीं दी गई, जबकि उसके पिता घर से रोज उसके आने-जाने का लगभग तीन हजार महीने का खर्च उठाने में असमर्थ थे। पिछले दिनों महाराष्ट्र के एक गांव में पंद्रह वर्षीय कबड््डी खिलाड़ी की अभ्यास से लौटते हुए स्थानीय लम्पटों ने सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी। क्या शौचस्थलों के बाद क्रीड़ास्थल भी गांवों में यौन अपराधों के अड््डे बनते जा रहे हैं? पिछले वर्ष केरल के साई हॉस्टल में रहने वाली ग्रामीण पृष्ठभूमि की तीन व्यथित तैराक लड़कियों ने आत्महत्या कर ली थी। उनसे दुर्व्यवहार के आरोपों की पृष्ठभूमि में साई ने एक आंतरिक जांच बिठाई, जिसकी प्रगति को आज तक बाहर साझा नहीं किया गया। ऐसे सैकड़ों-हजारों दृष्टांत हैं जो खेलों में जेंडर बजट के मोहताज हैं।

इस माहौल में, रियो ओलंपिक में महज लड़कियों के ही खाते में दो पदकआने से आम भारतीय बेहद भावुक हो उठा है। वह इस तर्क का कायल लगता है कि एक मध्यवर्गीय खेल परिवार की बेटी (पीवी सिंधू), एक किसान पृष्ठभूमि की बेटी (साक्षी मलिक) और एक श्रमिक की बेटी (दीपा कर्मकार) के ओलंपिक में क्रमश: रजत पदक, कांस्य पदकऔर चौथे स्थान की कीमत भारत जैसे देश के लिए कई-कई स्वर्ण पदकों जितनी होनी चाहिए! आखिर भारत वह देश है जहां एक ओर आम किसान-श्रमिक का जीवन कर्ज और शोषण से भरा रहता है और दूसरी ओर पूंजीशाहों को देश के लाखों करोड़ हड़पने दिए जाते हैं। जबकि साक्षी मलिक के गांव मोखरा खास (रोहतक, हरियाणा) में लिंग अनुपात है एक हजार पुरुषों के पीछे आठ सौ स्त्रियों का!

नीतिकारों-योजनाकारों और शासकों-प्रशासकों का समूह ही खेल की दुनिया में भी महिलाओं को जेंडर बजटिंग से वंचित रखे हुए है। तमाम सभ्य संसार में महिलाओं को समान अवसर व सामाजिक सुरक्षा देने और यौनिक हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा-हर्जाना-परामर्श कवच के रूप में जेंडर बजटिंग की अवधारणा एक सफल रणनीति की तरह इस्तेमाल हो रही है। क्या हमारे पास धन की कमी है? ‘निर्भया फंड’ में पिछले तीन वर्षों में तीन हजार करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं, पर जुमलेबाजी से सरकारों को इतनी भी फुरसत नहीं कि इस मद से एक पैसा भी खर्च कर सकें। अन्यथा, देश की बेटियों ने शायद मेडल की बाढ़ लाने की जिद बेहतर निभाई होती! साक्षी मालिक ने रियो में पदक जीतने पर कहा कि पहलवान बनने का निर्णय उसका अपना निर्णय था और ओलंपिक का सपना उसने बारह वर्ष जिया। दरअसल, भारतीय स्त्रियों ने शिक्षा के मोर्चे पर डटने के बाद खेल के मैदान को लैंगिक जुए को उतार फेंकने की अपनी जद््दोजहद में महत्त्वपूर्ण पड़ाव बना लिया है।

महिला विकास मंत्रालय देखने वाली मंत्री मेनका गांधी ने माना कि सिंधू, साक्षी और दीपा, तीनों लड़कियों ने अपने दम पर ओलंपिक सफलताएं हासिल की हैं और इसका विशेष तौर पर संज्ञान लेना चाहिए। काश, मंत्री को यह जानने की फुरसत भी होती कि निर्भया कांड के साढ़े तीन वर्ष बाद भी उनका मंत्रालय एक भी रेप क्राइसिस सेंटर क्यों नहीं स्थापित कर सका है। सरकार ने तब वर्मा आयोग की सिफारिश पर देश भर में सिंगल पॉइंट रेप क्राइसिस सेंटर बनाने का फैसला लिया था। भावना यह थी कि बलात्कार पीड़ित को जगह-जगह धक्के न खाने पड़ें और उसे तुरंत एक ही स्थान पर मेडिकल उपचार, कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श, आर्थिक सहयोग, सामाजिक सशक्तीकरण जैसी तमाम सुविधाएं दी जा सकें। होना तो यह चाहिए था कि पीड़ित का घर ही स्वत: रेप क्राइसिस सेंटर में बदल दिया जाता, जहां पहुंच कर डॉक्टर, पुलिस, मजिस्ट्रेट, जज, मनोचिकित्सक, परामर्शदाता, आर्थिक-सामाजिक प्रदाता अपना-अपना योगदान पहुंचाने के जिम्मेदार होते। लेकिन इतना सुगम कदम उठाना देश के शासन-प्रशासन के बस में कहां!

सरकारी-सामाजिक नजरिये के बावजूद, रियो में भारतीय लड़कियों की रिकॉर्डतोड़ भागीदारी, समाज की मुख्यधारा में उनकी बढ़ती दस्तक का जीवंत सूचक भी है। इनमें सानिया मिर्जा और सायना नेहवाल जैसे ग्लैमर भरे विश्व चैंपियन नामों के साथ तीरंदाजी, कुश्ती, हाकी जैसे पारंपरिक पुरुष खेलों की महिला भागीदार भी शामिल हैं। दरअसल ग्रामीण अंचलों, कस्बों और दूरदराज के शहरों में आज अभिभावक अपनी बेटियों के लिए खेल की दुनिया में निहित अवसरों को पहचानने लगे हैं। लड़कियां भी खेल के मैदान को पारंपरिक लैंगिक जुए से वक्ती मुक्ति की प्रणाली के रूप में देखने लगी हैं। लैंगिक पूर्वग्रह से भरे समाज में उन्होंने इसकी कीमत भी चुकाई होती है। खेलों में जेंडर बजट की अवधारणा के अभाव में, बहुतों ने कुछ ज्यादा ही!

लड़कियों को समाज की मुख्यधारा में लाने में खेलों की चौतरफा भूमिका को देखते हुए खेल मैदानों को उनके लिए सुरक्षित व संतुलित करना पूर्व-शर्त की तरह होना चाहिए। नि:संदेह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक महिला खिलाड़ियों का निरंतर उदय उन्हें उपलब्ध हो रही आधुनिक खेल सुविधाओं और खर्चीले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की देन कहा जा सकता है। इस वर्ष का केंद्र सरकार का खेल बजट लगभग नौ सौ करोड़ है जबकि पिछले वर्ष लगभग साढ़े छह सौ करोड़ रहा था। खेल संघों को भी एक सौ पचासी करोड़ की सहायता राशि दी जा रही है। यहां तक कि एंटी डोपिंग मद में बारह करोड़ और प्रतिभा-तलाश पर पांच करोड़ का प्रावधान किया गया है। तो भी खेल की दुनिया में भी एक जेंडर निरपेक्ष बजट ही बनता है।
खेलों में यदि जेंडर सापेक्ष बजट की अवधारणा लागू की जाती तो महिला खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता और खेलगत कौशल के साथ-साथ निश्चित ही उनकी सामाजिक सुरक्षा व भावनात्मक स्थिरता और उनके लिए जरूरी मनोवैज्ञानिक परामर्श व यौनिक हिंसा से बचने के उपायों को भी खेल पर खर्च का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा होता। जेंडर बजट होने का मतलब होता इस कार्यान्वयन के लिए वांछित वित्त की नियोजित व्यवस्था और खर्च-जवाबदेही की समुचित लेखा प्रणाली।

महिला सशक्तीकरण की दिशा में तरह-तरह के कितने भी कदम, जेंडर बजट न होने की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकते। इसे हम इजराइल के उदाहरण से समझ सकते हैं, जहां स्त्रियां जीवन के हर क्षेत्र में, यहां तक कि सेना की लड़ाकू (कॉम्बैट) भूमिका में भी, जमाने से लैंगिक बराबरी की मिसाल के रूप में देखी जाती हैं। सवाल है कि अपनी तमाम जीवटता के बावजूद वे भी खेलों में फिसड््डी क्यों हैं? इजराइल में टीम खेल सुविधाओं का इस्तेमाल करने वालों में सड़सठ फीसद पुरुष और तैंतीस फीसद महिलाएं हैं। इन सुविधाओं की देखरेख विभिन्न रीजनल कौंसिल के हाथ में है। मासे अशर रीजनल कौंसिल ने 2014-15 के खेल बजट की विशेष जेंडर आॅडिटिंग कराई जो मुख्यतया दो बिंदुओं पर केंद्रित रही- स्त्रियों और पुरुषों की अलग खेल जरूरतों को चिह्नित करना और उन्हें पूरा करने में राजनीतिक निर्णयों, जन सेवाओं और बजट आबंटन की भूमिका का विश्लेषण।

इस कवायद के निष्कर्ष बहुत कुछ भारतीय सामाजिक-लैंगिक स्थितियों पर भी खरे उतरते लगते हैं। उन्होंने पाया कि पेशेवर खेलों की भागीदारी में तो पुरुष और लड़के छाए हुए हैं ही, बल्कि समय व अवसर आबंटन में भी महिलाओं और लड़कियों की अपेक्षा उन्हीं की सुविधा व जरूरत को तरजीह मिलती है। जहां प्रारंभिक स्कूलों में छब्बीस फीसद लड़कियां खेलों में भागीदारी कर रही थीं वहीं माध्यमिक/हाइ स्कूलों तक आते-आते यह संख्या ग्यारह फीसद रह गई। प्रतियोगी खेलों से इतर, मनोरंजन के लिए पूर्ण वयस्कों की श्रेणी में तिरानवे फीसद महिलाएं खेलों में भाग लेती मिलीं। मुख्यतया थ्रो बॉल में आॅडिट ने पाया कि तैंतीस प्रतिशत महिला प्रतियोगी होने के बावजूद खेल बजट का इक्कीस प्रतिशत ही उन पर खर्च किया जा रहा था। जहां स्त्रियों में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल- जिम्नास्टिक- को पूरी तरह भागीदारों के फंड से ही चलाया जा रहा था वहीं पुरुषों में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल- वॉलीबॉल- को व्यापक पब्लिक फंडिंग मिल रही थी। पाया गया कि कुल पब्लिक फंडिंग का सत्तर फीसद पुरुष और तीस फीसद महिला खेलों पर खर्च हो रहा था। यहां तक कि महिलाओं के लिए वॉलीबॉल कोर्ट की मांग कौंसिल ने अनसुनी कर दी। कौंसिल की केवल पच्चीस फीसद कोच महिलाएं थीं। तमाम खेल संसाधनों का इस्तेमाल पुरुषों के लिए होता आ रहा था। आॅडिट ने स्त्रियों को बढ़ावा देने के लिए एक संचालन समिति और एक मास्टर प्लान की सिफारिश की। क्या ये सारे कदम भारत के संदर्भ में भी अभीष्ट नहीं? बस इनमें यौनिक हिंसा से सुरक्षा को और जोड़ना होगा।

ओलंपिक पदक में सारे देश की अपार दिलचस्पी ने महिलाओं/लड़कियों की खेल में भागीदारी को लैंगिक समानता के स्वीकार्य आयाम के रूप में स्थापित कर दिया है। सुखद है कि न कहीं से कपड़ों का रोना रोया गया और न कोई असुरक्षा का राग अलापता मिला। इसे नीतिकारों और योजनाकारों के लिए जेंडर बजट पर केंद्रित होने और जेंडर चैंपियनों की बड़ी फौज खड़ी करने का सही समय भी कहा जा सकता है।