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भारत में ज्यादातर त्योहारों की तारीख हर साल बदलती रहती है। कभी दिवाली आगे-पीछे होती है, तो कभी होली और ईद। लेकिन एक त्योहार ऐसा है, जो लगभग हर साल 14 या 15 जनवरी को ही आता है, और वो है मकर संक्रांति। आखिर ऐसा क्यों? इसका जवाब छिपा है भारतीय ज्योतिष, खगोल विज्ञान और हमारी प्राचीन जीवन-दृष्टि में। (Photo Source: Unsplash)
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चंद्र नहीं, सूर्य से जुड़ा त्योहार
भारत के अधिकांश त्योहार चंद्र पंचांग पर आधारित होते हैं। यानी चंद्रमा की कलाओं के अनुसार उनकी तिथि तय होती है, इसलिए उनकी डेट बदलती रहती है। लेकिन मकर संक्रांति एक सौर पर्व (Solar Festival) है, जो सूर्य की गति पर आधारित है। (Photo Source: Unsplash) -
इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, जिसे ज्योतिष में संक्रांति के नाम से जाना जाता है। यह परिवर्तन एक निश्चित समय पर होता है, इसलिए मकर संक्रांति की तारीख स्थिर रहती है। यही कारण है कि यह त्योहार समय की तरह स्थिर, ग्राउंडेड और निश्चित है- बिल्कुल सूर्य की तरह। (Photo Source: Unsplash)
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पूरे भारत का एक त्योहार, नाम कई
मकर संक्रांति सिर्फ एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे भारत का त्योहार है। नाम अलग-अलग हैं, पर भावना एक- उत्तर भारत में मकर संक्रांति और खिचड़ी पर्व, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में पोंगल, पंजाब में माघी/लोहड़ी और असम में माघ बिहू/भोगाली बिहू। (Photo Source: Express Archive) -
नाम चाहे अलग हों, लेकिन भावना एक ही है- कृतज्ञता (Gratitude)। सूर्य के प्रति, अन्न के प्रति, धरती के प्रति और उन सभी के प्रति जो हमें भोजन उपलब्ध कराते हैं- किसान, खेत और पशु। अगर पश्चिम में इसे ‘थैंक्सगिविंग’ कहते हैं, तो मकर संक्रांति हमारा सदियों पुराना ‘धन्यवाद उत्सव’ है। (Photo Source: Express Archive)
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नंदी और शिव की लोककथा
लोक कथाओं में मकर संक्रांति से जुड़ी एक रोचक कहानी मिलती है। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने नंदी से मनुष्य को अच्छे जीवन के लिए संदेश पहुंचाने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि मनुष्य को रोज तेल मालिश करनी चाहिए, रोज स्नान करना चाहिए और महीने में एक बार भोजन करना चाहिए। (Photo Source: Unsplash) -
लेकिन नंदी से संदेश में हल्की-सी भूल हो गई। वे धरती पर जाकर मनुष्यों से कह आए कि रोज भोजन करो, और महीने में एक बार स्नान करो। सर्दियों में यह बात सुनकर आपको नंदी ज्यादा अच्छे लगते होंगे। वहीं, जब महादेव को यह पता चला, तो उन्होंने क्रोध नहीं किया। (Photo Source: Unsplash)
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उन्होंने नंदी से कहा- ‘अगर मनुष्य रोज भोजन करेगा, तो अन्न की आपूर्ति के लिए तुम्हें धरती पर रहना होगा।’ यही कारण है कि मट्टू पोंगल के रूप में उन पशुओं की पूजा की जाती है, जो खेती में सहायता करते हैं- खासकर बैल और गाय। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि खेती सिर्फ इंसान नहीं, बल्कि प्रकृति और पशुओं का सामूहिक प्रयास है। (Photo Source: Unsplash)
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सूर्य और शनि: मतभेद के बावजूद स्वागत
पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य और उनके पुत्र शनि के संबंध अच्छे नहीं माने जाते। शनि की राशि है मकर, और जब सूर्य इसी राशि में प्रवेश करते हैं, तो वह दिन मकर संक्रांति कहलाता है। (Photo Source: Unsplash) -
दिलचस्प बात यह है कि मतभेदों के बावजूद, इस दिन सब कुछ भुलाकर स्वागत और मेल-मिलाप का संदेश दिया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे शनि सूर्य के साथ सब कुछ भुलाकर करते हैं। शायद इसी कारण इस दिन पूरा परिवार एक साथ बैठकर भोजन करता है। (Photo Source: Unsplash)
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भोजन सिर्फ पेट के लिए नहीं, रिश्तों के लिए
मकर संक्रांति का सबसे अहम हिस्सा है- भोजन। तिल, गुड़, खिचड़ी, पोंगल सब सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि प्रतीक हैं। जब सूर्य की गर्मी धरती में दबे बीजों तक पहुंचती है, तो फसल उगती है। उसी तरह, जब हमारे भीतर की अहंकार की बर्फ पिघलती है, तो रिश्तों में नरमी आती है। यही ऊपर उठना, यही भीतर से प्रकाश की ओर बढ़ना ‘उत्तरायण’ कहलाता है। (Photo Source: Unsplash)
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