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भारत में गाली देना केवल भाषा की आदत नहीं, बल्कि सामाजिक सोच और संस्कारों का भी प्रतिबिंब है। खासतौर पर जब गालियां मां, बहन या बेटी जैसे रिश्तों को निशाना बनाती हैं, तब यह समस्या सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मानसिकता पर सवाल खड़े करती है। इसी सोच को बदलने के लिए हरियाणा के जींद जिले के बीबीपुर गांव से एक अनोखी मुहिम शुरू हुई- ‘गाली बंद घर’ अभियान। (Photo Source: @suniljaglanofficial/instagram)
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क्या है गाली बंद घर अभियान?
साल 2014 में सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन के संस्थापक प्रोफेसर सुनील जगलान ने इस अभियान की शुरुआत की। प्रेरणा तब मिली जब उनकी बेटी ने खेल के मैदान में सुनी एक गाली का मतलब उनसे पूछा। इसके बाद जगलान ने महसूस किया कि पंचायत बैठकों से लेकर रोजमर्रा की बातचीत तक, महिलाओं को लेकर अपमानजनक शब्द कितनी सहजता से बोले जाते हैं। (Photo Source: @suniljaglanofficial/instagram) -
इस अभियान का उद्देश्य साफ है- ‘घरों, गलियों और समुदायों में लैंगिक गाली-गलौज को पूरी तरह बंद करना।’ जो इलाके इस संकल्प को अपनाते हैं, उन्हें औपचारिक रूप से ‘गाली-बंद’ (No-Swearing Zone) घोषित किया जाता है। (Photo Source: @suniljaglanofficial/instagram)
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70,000 लोगों का सर्वे, चौंकाने वाले आंकड़े
पिछले 12 वर्षों में यह अभियान एक राष्ट्रीय स्तर के सामाजिक सर्वे में बदल गया। 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 70,000 से ज्यादा लोगों से बातचीत की गई। सवाल सीधा था- ‘आप अपने आसपास मां, बहन या बेटी को लेकर अपमानजनक गालियां कितनी बार सुनते या बोलते हैं?’ सर्वे के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं। (Photo Source: Unsplash) -
सर्वे के मुताबिक भारत के सबसे ज्यादा गाली देने वाले राज्य हैं: दिल्ली – 80% (सबसे अधिक), पंजाब – 78%, उत्तर प्रदेश – 74%, बिहार – 74%, राजस्थान – 68%, हरियाणा – 62%, महाराष्ट्र – 58%, गुजरात – 55%, मध्य प्रदेश – 48%। (Photo Source: Unsplash)
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मध्यम और कम प्रचलन वाले राज्य: उत्तराखंड – 45%, छत्तीसगढ़ – 45%, पश्चिम बंगाल – 44%, कर्नाटक – 44%, तमिलनाडु – 44%, गोवा – 44%, हिमाचल प्रदेश – 43%, केरल – 42%, झारखंड – 41%, ओडिशा – 39%, आंध्र प्रदेश – 39%, तेलंगाना – 35%, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव – 32%, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह – 22%, पुदुचेरी – 18%। यानी कुल मिलाकर, हर दूसरा भारतीय (करीब 55%) मानता है कि उसके आसपास ऐसी भाषा आम है। (Photo Source: Unsplash)
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कहां सबसे कम गाली-गलौज?
उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी राज्यों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखी: अरुणाचल प्रदेश – 18%, असम – 18%, मिजोरम – 17%, नागालैंड – 16%, लक्षद्वीप – 16%। और सबसे कम मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम, लद्दाख, कश्मीर में 15% लोग अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं। यह फर्क बताता है कि भाषा केवल आदत नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल का नतीजा भी है। (Photo Source: Unsplash) -
पेशों के हिसाब से भी आई सच्चाई
सर्वे में यह भी देखा गया कि कौन-से पेशों में गाली-गलौज ज्यादा प्रचलित है: पुलिसकर्मी – 77%, वकील – 73%, राजनेता – 71%, कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स – 70%, पत्रकार – 68%, सफाई कर्मचारी/कुली – 64%, खिलाड़ी – 52%, स्वास्थ्य क्षेत्र – 42%, और शिक्षक – 41%। ये आंकड़े किसी को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने के लिए हैं। (Photo Source: Pexels) -
महिलाएं, युवा और डिजिटल असर
30% महिलाएं और लड़कियां या तो इस भाषा का इस्तेमाल करती हैं या इसे सहन कर लेती हैं। 20% युवा मानते हैं कि ऑनलाइन गेम्स, सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स ने उनकी भाषा को प्रभावित किया। करीब 30% लोगों का कहना है कि उन्हें हंसी-मजाक में भी गाली जरूरी लगती है। (Photo Source: Freepik) -
अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आया अभियान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में दिखाए जाने के बाद इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वहीं, यह अभियान तब अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के एक अपशब्द के इस्तेमाल पर कॉस्मोपॉलिटन मैगजीन ने सुनील जगलान की पहल का जिक्र किया। (Photo Source: Express Archived) -
एक ओर सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की भाषा, दूसरी ओर भारत के एक गांव से उठी मुहिम, जो महिलाओं के खिलाफ अपशब्दों को खत्म करने की कोशिश कर रही है। यही तुलना इस अभियान को वैश्विक पहचान दिला गई। (Photo Source: Express Archived)
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‘गाली बंद घर’ का असर
अभियान से जुड़ी कई महिलाओं और पुरुषों ने माना कि उन्हें एहसास हुआ कि बिना गाली के भी गुस्सा, मजाक और बातचीत संभव है। कई परिवारों में गाली-गलौज में वास्तविक कमी दर्ज की गई। (Photo Source: @suniljaglanofficial/instagram)
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