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चीन से आकर भारत के इस राज्य पर जिसने किया था 600 साल तक शासन, उनका कब्रिस्तान बना विश्व धरोहर

UNESCO’s World Heritage Site: असम के चराइदेव जिले में स्थित ताई-अहोम राजवंश के शाही कब्रिस्तान ‘मोइदम’ को यूनेस्को की विश्व धरोहर लिस्ट में शामिल किया गया है। 13वीं शताब्दी में चीन से आए ताई-अहोम राजवंश ने असम पर 600 साल तक शासन किया था।

By: Archana Keshri
July 27, 2024 16:55 IST
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  • Charaideo Moidams
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    असम के चराइदेव जिले में स्थित अहोम युग के ‘मोइदम’ को यूनेस्को की विश्व धरोहर लिस्ट में शामिल कर लिया गया है। मोइदम को शाही कब्रिस्तान भी कहा जाता है। यह अहोम युग का कब्रिस्तान है। ये चराइदेव इलाके के शिवसागर शहर से 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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    पूर्वोत्तर राज्यों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब किसी धरोहर को विश्व की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में जगह मिली है। इसके पहले काजीरंगा और मानस नेशनल पार्क को वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किया जा चुका है।

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    मोइदम के यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल होने के बाद अब भारत के धरोहरों की संख्या 43 हो गई है। इसके अलावा इससे पहले अब तक एशिया के किसी भी कब्रिस्तान को विश्व की ऐतिहासिक धरोहर में भी शामिल नहीं किया गया था।

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    बता दें, इस कब्रिस्तान में ताई-अहोम राजवंश के सदस्यों को दफनाया गया है। ओहम वंश के शाही लोगों को दफनाने के लिए बनाए गए टीलों को मोइदम कहा जाता है। ताई-अहोम राजवंश चीन से आई हुई जनजाति है, जिसने असम पर 600 साल तक शासन किया था।

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    ये लोग 13वीं शताब्दी में यहां पहुंचे थे। चराईदेव इनकी राजधानी थी। चराइदेव में स्थित मोइदम अहोम राजाओं और रानियों का कब्रिस्तान है। अहोम के पहले राजा चौ-लुंग सिउ-का-फा को उनकी मृत्यु के बाद चराईदेव में दफनाया गया था, जिसमें सभी ताई-अहोम धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान किए गए थे।

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    मोइदम में ताई-अहोम राजवंश मृतक को उनके प्रिय चीजों के साथ दफनाते थे, लेकिन 18वीं शताब्दी के बाद अहोम शासकों ने दाह संस्कार की हिंदू पद्धति अपना ली। इस प्रथा के बाद चराईदेव में दाह संस्कार की गई हड्डियों और राख को मोइदम में दफना दिया।

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    मोइदम शब्द ताई शब्द फ्रांग-माई-डैम या माई-टैम से लिया गया है। फ्रांग-माई का अर्थ है कब्र में डालना या दफनाना और डैम का मतलब है- मृतक की आत्मा।

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    19वीं शताब्दी तक असम पर अहोम वंश का वर्चस्व रहा था। उस वंश के लोग अपने राजाओं को दिव्य मानते थे। इसलिए उन्होंने शाही दफन के लिए मोइदम के निर्माण की एक अलग फ्यूनरल ट्रेडिशन विकसित की थी। मृतकों को दफनाने के लिए उनके द्वारा बनाए गए टीले की बनावट खास होती थी।

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    हर मोइदम में तीन हिस्से होते हैं। पहला, एक कमरा या वॉल्ट जिसमें शरीर को रखा जाता है। दूसरा, कमरे को ढकने वाला एक अर्धगोलाकार टीला और तीसरा टॉप पर ईंट की एक संरचना होती है, जिसे चाव चाली कहा जाता है। इन मोइदम का आकार छोटे टीले से लेकर बड़ी पहाड़ियों तक होती थी। (PTI Photos)
    (यह भी पढ़ें: ओपनिंग सेरेमनी पर रोशनी से जगमगाया एफिल टॉवर, ओलंपिक रिंग्स और लाइटिंग की सजावट ने जीता लोगों का दिल, देखें अद्भुत तस्वीरें)

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