पिछले कुछ दिनों से देश में एक नई बहस ने जोर पकड़ लिया है- 9-9-6 मॉडल, यानी सप्ताह में छह दिन सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक काम करने की सलाह। यह बहस तब शुरू हुई जब इंफोसिस के को-फाउंडर नारायण मूर्ति ने चीन के इस मॉडल का उदाहरण देते हुए भारत में काम के घंटों को बढ़ाने का सुझाव दिया। इससे पहले भी वे भारतीय युवाओं के लिए सप्ताह में 70 घंटे काम करने की सलाह दे चुके हैं। सवाल यह है कि इस तरह के बयान किस दिशा की ओर इशारा करते हैं? क्या वाकई ज्यादा समय काम करने से देश आगे बढ़ता है? या यह सोच पुरानी होती जा रही है और दुनिया इससे काफी अलग रास्ता पकड़ चुकी है?

भारत जैसे देश में, जहां बड़ी संख्या में युवा आबादी है और विकास की गति तेज मानी जाती है, यह चर्चा और भी जरूरी हो जाती है कि काम का बढ़ता बोझ समाधान है या नई समस्याओं का निमंत्रण। मूर्ति का मानना है कि अगर भारत को आर्थिक रूप से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है तो लोगों को ज्यादा घंटे काम करना चाहिए। लेकिन सवाल है कि क्या घंटे बढ़ाने से प्रोडक्टिविटी अपने आप बढ़ जाएगी?

दुनिया के कई विकसित देशों पर नजर डालें तो तस्वीर उलट दिखती है। डेनमार्क, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, जर्मनी जैसे देशों में औसतन कर्मचारी सप्ताह में 31 से 37 घंटे काम करते हैं, लेकिन उनकी उत्पादकता दुनिया में सबसे ऊंचे स्तर पर है। वे कम काम करते हैं, लेकिन बेहतर ढंग से काम करते हैं। डेनमार्क में काम के घंटे 37 हैं लेकिन वह दुनिया का सबसे खुशहाल देश है। इन अनुभवों से यह साफ संकेत मिलता है कि काम के घंटे और उत्पादकता का सीधा रिश्ता हमेशा वैसा नहीं होता, जैसा माना जाता है।

भारत में भी कई कंपनियां अब यह समझने लगी हैं कि कर्मचारियों को लगातार लंबे समय तक काम में झोंक देने से थकान, तनाव, बर्नआउट और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ती हैं। ऐसे माहौल में कर्मचारियों की क्रिएटिविटी और स्किल दोनों प्रभावित होती हैं। इसलिए यह सोच कि ‘जितना ज्यादा काम, उतनी ज्यादा तरक्की’ – आज के दौर में बहुत सीमित और एकतरफा नजरिया लगती है।

एक और बड़ा मुद्दा है जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड में रहता है वो है वर्क-लाइफ बैलेंस। नारायण मूर्ति के समय में उनका पूरा ध्यान कंपनी पर था। उनकी पत्नी सुधा मूर्ति घर और बच्चों को संभालती थीं। यह व्यवस्था भारत में सदियों से चली आ रही एक तरह की परंपरागत व्यवस्था थी, जो आज के भारत में बहुत तेजी से बदल चुकी है। आज ज्यादातर शहरी परिवारों में पति और पत्नी दोनों नौकरीपेशा हैं। ऐसे में अगर दोनों सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक, सप्ताह में छह दिन काम करें तो घर, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी कौन संभालेगा?

यह बात समझना जरूरी है कि हर परिवार की आर्थिक और सामाजिक संरचना अलग होती है। सभी के पास घरेलू मदद उपलब्ध नहीं होती। सभी के पास बच्चों की देखभाल के लिए दादा-दादी या रिश्तेदार भी नहीं होते। ऐसे में यदि दोनों माता-पिता को 12-12 घंटे काम करने के लिए प्रेरित किया जाए तो इसका सीधा असर बच्चों की परवरिश, स्वास्थ्य और मानसिक विकास पर पड़ता है।

क्या नारायण मूर्ति के सुझाव में इस वास्तविकता के लिए कोई जगह है? या यह सलाह मुख्य रूप से पुरुषों की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर दी गई है? यदि महिलाएं भी करियर बनाना चाहें और आज वे बड़ी संख्या में ऐसा कर रही हैं तो इस 9-9-6 मॉडल में उनके लिए जगह कहां है?

आज का भारत महिलाओं की भागीदारी के बिना वैसा विकास नहीं कर सकता जैसा वह चाहता है। अगर काम के घंटों की नीति ही महिलाओं के लिए बाधा बन जाए तो यह विकास के बिल्कुल उलट दिशा में ले जाने वाली बात होगी।

सबसे बड़ी विचार करने वाली बात यह भी है कि भारत अभी दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और यह सफलता हम सप्ताह में 40–45 घंटे काम करके हासिल कर चुके हैं। इसका मतलब है कि भारतीय कर्मचारी वैसे भी मेहनती, सक्षम और उत्पादक हैं। हा, सुधार की जगह हर जगह होती है लेकिन सिर्फ काम के घंटे बढ़ाना ही समाधान नहीं है।

समस्या असल में काम की गुणवत्ता, टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल, सही मैनेजमेंट और स्किल डेवलपमेंट की है। अगर कर्मचारी बेहतर तरीके से प्रशिक्षित हों, तकनीक का सही इस्तेमाल हो और ऑफिस का माहौल अच्छा हो तो प्रोडक्टिविटी अपने आप बढ़ती है। यह बात दुनिया के कई बड़े शोध और रिपोर्ट्स से साबित हो चुकी है।

आज की कॉर्पोरेट दुनिया में सबसे अहम बात है- स्मार्ट वर्क, न कि सिर्फ लॉन्ग आवर्स। लंबे घंटे काम करने से न आप ज्यादा रचनात्मक बनते हैं, न टीम ज्यादा एडवांस और न कंपनी खुद ही महान बन जाती है। भारत को एक ऐसे मॉडर्न, संवेदनशील और स्मार्ट ऑफिसेज की जरूरत हो जहां कर्मचारी डिप्रेशन में नहीं बल्कि इस माहौल में घर जाएं कि वहां खुश रहें, अपने परिवार के साथ समय बिताएं।

नारायण मूर्ति एक सफल उद्यमी हैं और उनके अनुभवों से सीखना निश्चित रूप से फायदेमंद हो सकता है। लेकिन हर अनुभव हर समय के हिसाब से फिट नहीं होता। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और काम करने के तरीके भी बदलते हैं। आज का युवा सिर्फ काम नहीं करना चाहता, वह अच्छी जिंदगी चाहता है, स्वास्थ्य चाहता है, समाज में भागीदारी चाहता है, घूमना चाहता है, रील बनाना चाहता है और सबसे बड़ी बात कि मानसिक शांति भी चाहता है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि 40 घंटे काम करना चाहिए या 70 घंटे। असली सवाल यह है कि हम जो काम कर रहे हैं, उससे क्या हम अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल कर पा रहे हैं? अगर 40 घंटे में ही काम बेहतरीन तरीके से हो रहा है तो 70 घंटे बिताकर थकान और तनाव क्यों बढ़ाएं?

त्यौहार प्रधान कहे जाने वाला हमारे देश भारत को ऐसे वर्क कल्चर की जरूरत है जो कर्मचारियों को इंसान समझे, सिर्फ संसाधन नहीं। कर्मचारी सिर्फ ऑफिस में ना रहें, घर जाएं और परिवार के साथ खुश रहें। यही असली विकास है और इसी रास्ते पर भारत आगे बढ़ सकता है।