लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा का जन्म 7 जनवरी, 1926 को हुआ था। जनरल सिन्हा उस वक्त में सेना में आए जब भारत औपनिवेशिक शासन से आजादी की ओर बढ़ रहा था। जनरल सिन्हा सैनिक, विद्वान, प्रशासक, राजनयिक और राज्यपाल के रूप में उस परंपरा के प्रतिनिधि थे जो बुद्धिमत्ता, संस्कृति की समझ और नैतिक आत्मविश्वास को अहमियत देती थी।
जनरल सिन्हा को मन्नय सिन्हा के नाम से जाना जाता था।
सिन्हा द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में भारतीय सेना में शामिल हुए और उन्होंने 1947 के अशांत माहौल को करीब से देखा। मिलिट्री ऑपरेशंस डायरक्टरेट में तैनात रहते हुए उन्होंने बंटवारे और जम्मू-कश्मीर पर कबायली हमलों के दौरान भारत की सुरक्षा चुनौतियों को समझा।
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कश्मीर को गहराई से समझते थे जनरल सिन्हा
कश्मीर एक ऐसा विषय था जिसे वह गहराई से समझते थे। उनका करियर सैनिक जीवन के सभी पहलुओं को समेटे हुए था। जैसे- उन्होंने युद्धक्षेत्र में टुकड़ियों की कमान संभाली, संवेदनशील खुफिया और स्टाफ भूमिकाओं में काम किया और यहां से होते हुए वह आर्मी में डिप्टी चीफ की कुर्सी तक पहुंचे। वह इन्फैंट्री स्कूल और डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में तैनात रहे, जहां उन्होंने मेरे पिता के साथ काम किया।
मुझे उन्हें करीब से जानने का मौका तब मिला जब मैंने पहले उरी ब्रिगेड के कमांडर के रूप में काम किया और बाद में जब वह जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे तब मैं बारामूला में डैगर डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग के पद पर तैनात था। जनरल सिन्हा तब सिर्फ राज्यपाल से कहीं ज्यादा थे। उन्होंने सुरक्षा के हालात का गहन अध्ययन किया और बारीकियों को समझा।
कश्मीर में शांति प्रक्रिया को लेकर विचार
मार्च 2005 में मुझे उन्हें उरी-मुजफ्फराबाद रोड पर नियंत्रण रेखा के किनारे स्थित कमान अमन सेतु तक ले जाने का मौका मिला। वहां मैंने उन्हें अगले महीने शुरू होने वाली कारवां-ए-अमन बस सेवा की तैयारियों के बारे में जानकारी दी। सिन्हा का मानना था कि कश्मीर में शांति प्रक्रियाएं केवल ताकत के इस्तेमाल से लंबे वक्त तक नहीं चल सकतीं।
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संगीत उत्सव का किया समर्थन
जनरल सिन्हा की इस तरह की सोच पहले भी दिखी थी, जब घाटी में आतंकवाद चरम पर था। तब उन्होंने डल झील के किनारे एक संगीत उत्सव आयोजित किए जाने का समर्थन किया। उनका इरादा कश्मीर की उदार परंपराओं के साथ एकजुटता दिखाना और कट्टरपंथी तत्वों को सार्वजनिक स्थानों और अभिव्यक्ति पर एकाधिकार करने से रोकने का था।
सिन्हा के रैंक और रेजिमेंट से अच्छे संबंध रहे। मुझे याद है कि मैंने उनके साथ नियंत्रण रेखा के पास एक गोरखा यूनिट का दौरा किया था; वहां निरीक्षण का नहीं सैनिकों के बीच काफी अच्छा माहौल था।
कश्मीर की मीडिया के साथ उनका जुड़ाव नेतृत्व का एक और उदाहरण था। घाटी के पत्रकारों के सवालों से कई अफसर घबराते थे लेकिन जनरल सिन्हा ने ना तो कभी सवालों को टाला और ना ही उन्होंने कभी दबदबा बनाने की कोशिश की। मीडिया ने महसूस किया कि वे एक ऐसे व्यक्ति का सामना कर रहा है जिसे घेरा नहीं जा सकता।
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रणनीतिक चुनौतियों पर लिखी किताबें और लेख
लंबे समय तक आतंकवाद रोधी अभियानों में काम करने वाले अफसर मुश्किलों को संभालने की क्षमता विकसित कर लेते हैं। सिन्हा इसका उदाहरण थे।
सेना से रिटायर होने के बाद सिन्हा ने नेपाल में राजदूत, असम के और बाद में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में अहम भूमिकाएं निभाई। उन्होंने भारत की रणनीतिक चुनौतियों से संबंधित कई पुस्तकें और लेख भी लिखे।
आज भारत उनकी जन्म शताब्दी मना रहा है, ऐसे में जनरल सिन्हा की विरासत एक ऐसे सैनिक-राजनेता के रूप में अमर है, जिनका मानना था कि वर्दी में बौद्धिकता कोई अलंकार नहीं बल्कि एक कर्तव्य है।
(लेखक 15 कोर के पूर्व कोर कमांडर और एनडीएमए के सदस्य हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
