भारत में बदलाव और विकास को रफ्तार देने के लिए नवाचार एक अहम पहलू है। इस समय कृत्रिम मेधा के माध्यम से भारत सबसे अग्रणी होने का प्रयास कर रहा है। इंटरनेट की शक्ति को 6जी से आगे ले जाने की कोशिश हो रही है और हर पुराने तरीके को कृत्रिम मेधा की सहायता से बदलने की पहल हो रही है। दावा किया जाता है कि वैश्विक स्तर पर विज्ञान और नवाचार के मामले में भारत तेजी से उभर रहा है। शोध कार्यों में भी देश किसी से पीछे नहीं है। पेटेंट की बात की जाए तो इसके लिए उद्यम और प्रौद्योगिकी में हम लगातार नए अन्वेषण कर रहे हैं। पेटेंट मामले में भारत दुनिया में छठे स्थान पर पहुंच गया है। विज्ञान और इंजीनियरिंग के मामले में दावा किया जाता है कि हम शीर्ष देशों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। मगर शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार की राह अब भी कई तरह की चुनौतियों से घिरी हुई है।

वैश्विक नवाचार में जो मुकाबला होता है, उसमें भारत ने लगातार अपनी बढ़त बनाई है और वह 90वें पायदान से तीसवें स्थान पर पहुंच गया है। भारत के भावी प्रौद्योगिकी मिशनों में भी इसका विस्तार करने और सार्वजनिक क्षेत्र में कृत्रिम मेधा के विकास का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इसके लिए शिक्षा में जो परिवर्तन होना चाहिए, वह अभी तक नहीं हुआ है। शिक्षा परिसरों में जो नवाचार दिखाई देना चाहिए, वह भी नहीं दिखाई देता। निजी क्षेत्र ने विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों में भारी निवेश किया है। पंजाब को ही लें। इस राज्य में तीन मुख्य विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और दूसरे विश्वविद्यालय जरूर खुल गए हैं, लेकिन उनमें विद्यार्थियों की कमी तो है ही, वहीं सटीक पाठ्यक्रमों का अभाव भी नजर आता है। यहां कहीं नवाचार नहीं दिखाई देता है।

केंद्र सरकार ने समग्र शिक्षा अभियान शुरू किया था। इसमें देश की विभिन्न शिक्षा प्रणालियों को एक साथ मिला कर सीधा रास्ता निकालने की कोशिश की गई थी। अब इस अभियान में भी नवाचार की घोषणा शिक्षा मंत्री ने की है। शिक्षा क्षेत्र में बड़े सपने देखने के साथ भारत अब अंतरिक्ष विज्ञान में भी नई बुलंदियों को छूना चाहता है। वह अमेरिका या रूस के मुकाबले किसी भी तरह पीछे नहीं रहना चाहता। हालांकि दूसरे क्षेत्रों में विकास की अब भी बहुत गुंजाइश है। वैसे मुद्दे की बात यह है कि शिक्षा के सभी पुराने ढर्रे अब बदले जाने चाहिए।

विज्ञान की समझ हर विद्यार्थी में हो, तभी शिक्षा में विकास के सपने पूरे हो सकेंगे। मगर इन सबके लिए पूंजी चाहिए। नीति आयोग यह कहता है कि कम से कम छह फीसद व्यय शिक्षा के विकास पर होना चाहिए, लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद और विकास की बुलंदियों को छू लेने के दावों के बावजूद देश ने कभी भी सकल घरेलू उत्पाद में से छह फीसद शिक्षा पर खर्च नहीं किया। हमेशा यह खर्च आंकड़ों में दिखाया जाता है, फीसद में नहीं, ताकि आबादी के लिहाज से तेजी से बढ़ते हुए देश में शिक्षा में बदलाव की धीमी गति को लेकर कोई उलझन पैदा न हो।

हम शिक्षा के विकास में कृत्रिम मेधा के जरिए विश्व का नेतृत्व करना चाहते हैं। सरकार का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमता नैतिक, पारदर्शी और डेटा गोपनीयता सिद्धांतों पर आधारित हो। इसके अलावा यह समावेशी और मितव्ययी हो, लेकिन सच तो यह है कि मितव्यय के नाम पर धन का आबंटन अब भी कम है, लेकिन न तो यह समावेशी हो सका है और न ही वहनीय। सवाल यह है कि अगर समावेशी, रोजगारपरक और अन्वेषणपूर्ण शिक्षा को गांव-गांव तक पहुंचाना है, तो इसके लिए उद्यम कहां है?

अगर आज भी यह रपट आती है कि भारत में हजारों प्राथमिक विद्यालयों में एक-एक अध्यापक कई कक्षाओं को संभाल रहे हैं, तो शिक्षा में नई तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टि को आत्मसात करने का लक्ष्य कब पूरा होगा? पंजाब को ही लें, आज भी यहां अधिकतर छात्र कला संकायों की ओर जा रहे हैं। जबकि नई शिक्षा नीति यह कहती है कि शुरू से लेकर उच्च स्तर तक नई पीढ़ी कला और साहित्य के साथ-साथ विज्ञान एवं तकनीक का भी अध्ययन करे।

दूसरी ओर आलम यह है कि स्कूलों में दाखिले का फीसद जरूर बढ़ गया है, लेकिन दसवीं तक आते-आते विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ रही है। इसकी वजह है-परिवारों की आर्थिक असुरक्षा और रोजगार की अनिश्चितता। वहीं देश की युवा पीढ़ी में काम करने की इच्छा लगातार घट रही है, तो इसका कारण उदारता से बांटी गई रेवड़ियां भी हैं।

अजब विडंबना है कि एक ओर देश आर्थिक शक्ति बनता दिख रहा है और हम भविष्य में तीसरी आर्थिक महाशक्ति बनने का दावा कर रहे हैं। आजादी के शतकीय महोत्सव 2047 तक हम महाशक्ति बनना चाहते हैं। दूसरी ओर युवा पीढ़ी को अनुकंपा के जरिए धीरज रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसे विरोधाभास नहीं तो और क्या कहा जा सकता है।

उच्च शिक्षा में ज्यादातर विद्यार्थी कला और साहित्य क्षेत्र में शोध करना चाहते हैं। विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में शोध की प्रवृत्ति नहीं बढ़ रही। हम कृत्रिम मेधा से नवाचार की ओर बढ़ना चाहते हैं, लेकिन हमारा शोध इस क्षेत्र की बुलंदियों की ओर जाता नहीं दिख रहा। हम कृत्रिम मेधा से नवाचार की बात जरूर करते हैं, लेकिन सवाल है कि कितने प्रशिक्षण संस्थान हमने इसके लिए बनाए हैं। कितने अध्यापकों को हमने नई शिक्षा विधि में निपुण बनाया है?

नई शिक्षा नीति तो कहती है कि युवा पीढ़ी के प्रशिक्षण को किताबों के साथ-साथ यथार्थ से भी जोड़ा जाना चाहिए, मगर वास्तव में ऐसा हो नहीं पा रहा है। पुरानी नौकरियां अब खत्म हो रही हैं, क्योंकि दफ्तरों में सब काम कागज रहित होता जा रहा है। हालांकि अब भी अधिकतर संस्थानों में नौकरियों का वही पुराना ढर्रा है। दूसरी ओर चिकित्सा और इंजीनियरिंग की डिग्रियां अब युवा पीढ़ी के लिए अंतिम विकल्प नहीं रह गई हैं।

इसमें दोराय नहीं कि अब कृत्रिम मेधा में दक्ष पीढ़ी तैयार हो रही है। यही लक्ष्य भी होना चाहिए। मगर अभी तक इसमें नवाचार सतही स्तर पर ही दिखाई देता है। पाठ्यक्रमों में बदलाव नहीं दिख रहा और न ही इस दिशा में पुस्तकें लिखी जा रही हैं। अध्यापन विधि भी नहीं बदल रही।

जबकि यथार्थ के धरातल पर नई पीढ़ी को खड़ा करना नई शिक्षा नीति का लक्ष्य होना चाहिए। फिलहाल इस बारे में दावे तो किए जाते हैं, लेकिन यह वास्तविक रूप से कहीं गतिमान नजर नहीं आता। अगर निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित कर समावेशी विकास के लिए दरवाजे खोलने हैं, तो समावेशी शिक्षण होना चाहिए। इस पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

कृत्रिम मेधा के उपयोग में आगे बढ़ने के दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन हमारी उत्पादन प्रक्रिया में इसके इस्तेमाल से लागत कम होती नजर नहीं आती। कृषि क्षेत्र में तो आज भी कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल न के बराबर है। समग्र शिक्षा अभियान में नवाचार का सपना सुंदर है, परंतु देश इस दिशा में तेजी से बढ़ता हुआ नजर नहीं आता। ऐसे में शिक्षा को नवाचार से जोड़ने के प्रयास करने होंगे।