असम में रेलगाड़ियों की टक्कर से हाथियों की मौत कोई संयोग नहीं है, बल्कि लगातार विफल होते तंत्र का उदाहरण भी है। विकास की रफ्तार, प्रशासनिक लापरवाही और वन्यजीव संरक्षण की कमजोर इच्छाशक्ति एक साथ मिल कर प्रकृति के इस संवेदनशील प्राणी को कुचल रही हैं। बीते दस वर्षों में अकेले असम में रेल पटरियों पर 60 से अधिक हाथियों की मौत हो चुकी है। हाथियों की मौत इस सच्चाई को रेखांकित करती है कि यह समस्या आकस्मिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक और प्रणालीगत है। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच रेल हादसों में लगभग 186 हाथियों की जान गई।

भारत में रेलवे का 69 हजार किलोमीटर से अधिक लंबा संजाल देश के हर भू-भाग को जोड़ता है, लेकिन सैकड़ों स्थानों पर रेल पटरियां घने जंगलों, हाथी आवासों और सदियों पुराने प्राकृतिक गलियारों के बीच सेगुजरती हैं। असम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां ब्रह्मपुत्र घाटी, पहाड़ी जंगल, चाय बागान और सीमित खुली जमीन के बीच रेल लाइनें उन रास्तों को चीरती हैं, जिनका उपयोग हाथी पीढ़ियों से करते आए हैं। हाथी नक्शों पर खींची गई सरकारी रेखाओं से नहीं चलते, बल्कि वे स्मृति, अनुभव और प्राकृतिक संकेतों के सहारे चलते हैं। जब उनके रास्ते में लोहे की पटरियां आ जाती हैं, तो उनके सामने विकल्प लगभग समाप्त हो जाते हैं। नागांव, होजई, मोरीगांव और लुमडिंग जैसे इलाकों में बार-बार होने वाले हादसे इस सच्चाई को उजागर करते हैं।

पिछले वर्ष दिसंबर में असम के होजाई जिले में सैरांग-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस से आठ हाथियों की मौत, किसी एक गलती का नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही का परिणाम हैं। हर हादसे के बाद बयान आते हैं, संवेदनाएं व्यक्त होती हैं, कुछ तकनीकी उपायों की घोषणा होती है और फिर वही चक्र दोहराया जाता है। सरकार का दावा रहा है कि हाथियों की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए गए हैं।

वर्ष 2022 में केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने संसद में बताया था कि रेलवे और पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वय समितियां बनाई गई हैं, संवेदनशील क्षेत्रों में गति सीमा तय की गई है। भूमिगत मार्ग और ‘रैम्प’ बनाए जा रहे हैं। चेतावनी संकेत लगाए गए हैं और लोको पायलटों को भी सतर्क किया गया है। इसके साथ ही एआइ-आधारित आइडीएस की शुरुआत की गई है, जो पटरियों के पास बड़े जीवों की मौजूदगी का पता लगा कर सचेत करता है। कागजों पर यह तस्वीर संतोषजनक दिखती है, लेकिन जमीन पर हर नई मौत इन दावों को कठघरे में खड़ा कर देती है।

जब उपाय मौजूद हैं, तो पटरियों पर हाथियों की मौत क्यों हो रही है?

असल सवाल यह है कि जब उपाय मौजूद हैं, तो पटरियों पर हाथियों की मौत क्यों हो रही है? नगांव जैसी घटनाएं बताती हैं कि गति सीमा या तो लागू नहीं होती या उसका पालन नहीं किया जाता। आइडीएस जैसी व्यवस्था कई जगह की गई है, लेकिन वे तभी कारगर होंगे, जब सतर्क होने का संकेत मिलते ही ट्रेन की गति स्वत: घटे या ब्रेक लगे।

आज स्थिति यह है कि सेंसर सतर्क कर देते हैं, नियंत्रण कक्ष तक सूचना भी पहुंचती है, लेकिन निर्णय-प्रक्रिया इतनी धीमी है कि तेज रफ्तार ट्रेन हाथियों तक पहुंचने से पहले रुक नहीं पाती। कोई 90-100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही ट्रेन को रुकने के लिए लगभग एक किलोमीटर की दूरी चाहिए और जंगलों में मोड़दार पटरियों पर लोको पायलट को हाथी दिखाई देने तक बहुत देर हो चुकी होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि असम में हाथियों की मौत कोहरे या दृश्यता की कमी की वजह से नहीं, बल्कि योजना की मूलभूत खामियों का नतीजा है। कई रेल लाइनें ऐसे समय में बिछाई गई, जब हाथियों के पारंपरिक मार्गों का अध्ययन नहीं किया गया या उन्हें जानबूझ कर नजरअंदाज किया गया। परिणामस्वरूप, कई ऐसे क्षेत्र हैं जो आधिकारिक रूप से ‘हाथी गलियारा’ घोषित नहीं हैं, लेकिन व्यवहार में वही हाथियों के मुख्य रास्ते हैं। रेल प्रशासन इन्हें गैर-संवेदनशील मान कर तेज रफ्तार ट्रेनों का संचालन करता है और दुर्घटनाएं होती हैं।

यह संकट केवल असम तक सीमित नहीं

यह संकट केवल असम तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार-सिलीगुड़ी खंड, ओड़ीशा के क्योंझर, तमिलनाडु-केरल के मदुक्कराई क्षेत्र और उत्तराखंड के हरिद्वार-देहरादून मार्ग पर भी इसी तरह की घटनाएं दर्ज होती रही हैं। हर जगह स्थिति लगभग एक जैसी है, रेल लाइन हाथियों के पारंपरिक मार्ग को काटती है। रात या सुबह के धुंधलके में हाथी झुंड में पटरियां पार करते हैं और तेज रफ्तार ट्रेन से टकरा जाते हैं।

हाथियों की सामाजिक संरचना इस त्रासदी को और भयावह बना देती है। हाथी झुंड में चलते हैं और एक-दूसरे के प्रति गहरा लगाव रखते हैं। जब झुंड का एक सदस्य घायल होता है, तो बाकी उसे छोड़ कर नहीं भागते बल्कि उसकी मदद के लिए रुक जाते हैं। यही कारण है कि ट्रेन ही टक्कर में कई हाथियों की जान चली जाती है। कई बार अपने बच्चों की जान बचाने की कोशिश में मादाएं अपनी जान गंवा देती हैं। इस तरह का दृश्य केवल वन्यजीव प्रेमियों को ही नहीं, किसी भी संवेदनशील मनुष्य को भीतर तक झकझोर देता है।

रोकथाम के उपायों पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट है कि केवल तकनीक समाधान नहीं है। एआइ-आधारित व्यवस्था तब तक प्रभावी नहीं होगी, जब तक चौबीस घंटे प्रशिक्षित स्टाफ द्वारा उसकी निगरानी नहीं होगी। हर सतर्कता संदेश पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। हाथियों की आवाजाही को मौसम, कोहरे, चांदनी और समय के साथ जोड़ कर विश्लेषण करना होगा और उसी आधार पर ट्रेन की आवाजाही और गति तय करनी होगी। सुबह-शाम और रात के उन घंटों में, जब हाथियों की सक्रियता सबसे अधिक होती है, संवेदनशील रेलखंडों में गति को सख्ती से घटाना होगा।

इसके साथ ही, वन और रेलवे विभाग की साझा गश्त को औपचारिकता से निकाल कर वास्तविक जमीनी निगरानी में बदलना होगा। स्थानीय वनकर्मियों और आसपास के समुदायों को भी इस तंत्र का हिस्सा बनाना होगा, क्योंकि वे जंगलों की नब्ज बेहतर समझते हैं। ऊंचाई पर रेलमार्ग और समर्पित वन्यजीव क्रासिंग ही स्थायी समाधान दे सकते हैं। झारखंड और उत्तराखंड में ऐसे प्रयोगों से सकारात्मक परिणाम मिले हैं, ऐसे में असम में भी इन्हें प्राथमिकता के साथ लागू किया जाना चाहिए।

संकट का सामाजिक-पर्यावरणीय पहलू भी

इस पूरे संकट का सामाजिक-पर्यावरणीय पहलू भी है। असम के कई जिलों में चाय बागान, खनन, सड़क निर्माण और बस्तियों के विस्तार ने हाथियों के आवास को छोटा कर दिया है। जब भोजन और पानी की तलाश में हाथी इंसानी इलाकों की ओर बढ़ते हैं, तो रेल पटरियां उनके रास्ते में घातक दीवार बन जाती हैं। यह रेल नेटवर्क अब उनके लिए एक ‘मूक हत्यारा’ बन चुका है, जो उनकी पीढ़ियों को मिटा रहा है। सबसे चिंताजनक पहलू जवाबदेही का अभाव है। हर बड़े हादसे के बाद जांच के आदेश तो दिए जाते हैं, लेकिन उनकी रपटें शायद ही कभी सार्वजनिक होती हैं। यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि किस स्तर पर लापरवाही हुई, कौन सी व्यवस्था विफल हुई और उसे सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे। जब तक यह पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक सुधार के दावे खोखले ही रहेंगे।

(लेखक: योगेश कुमार गोयल)

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