देश में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान हमें नजर नहीं आता। अब स्थिति यह है कि इसका हल निकालने के बजाय रेवड़ियां बांटी जा रही हैं। यहां सब चलता है, यह भाव तब और तीक्ष्ण हो जाता है, जब हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी जो देश की शक्ति है, वह नशे की अंधेरी दुनिया में गुम हो रही है। ऐसे में न केवल देश, बल्कि नई पीढ़ी भी जोखिम में है। अगर इस पर गंभीरता से न सोचा गया, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। पिछले दिनों पंजाब सरकार की ओर से एक आदेश में कहा गया कि किसी भी व्यक्ति को पांच से अधिक नशा मुक्ति केंद्र खोलने की इजाजत नहीं होगी।

दरअसल, नशा मुक्ति केंद्र ही अन्य प्रकार का नशा फैलाने वाले स्थल बनते जा रहे हैं। नशा छुड़ाने वाली गोलियों की लत भी नौजवानों को ऐसे लग जाती है कि वे उसी पर निर्भर होने लगते हैं। जैसे वे कभी चिट्टे और हेरोइन की लत के शिकार थे। नतीजा यह कि कई नशा मुक्ति केंद्र अब संदेह के घेरे में हैं। नशा छोड़ने के इच्छुक नौजवानों में दवा की जो गोलियां मुफ्त बांटी जाती हैं, अमूमन उसी की उन्हें लत लग जाती है। बाद में यही दवा उन्हें महंगे दामों में बेची जाती है। इस पैसे से दूसरे लोग अपने लिए चिट्टा जैसा नशीला पदार्थ खरीदते हैं। इस तरह चिट्टे से लेकर नशा छुड़ाने वाली दवा का एक ऐसा कुचक्र बन गया है, जिसे तोड़ना आसान नहीं है।

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सवाल है कि जब बाड़ ही खेत को खाने लगे, तो उसका रखवाला कौन होगा। जब इस नशाखोरी की तह में जाते हैं, तो पता चलता कि कई दवा विक्रेता भी इस षड्यंत्र में संलिप्त हैं। इन्हीं से सांठगांठ कर युवा दवाइयां खरीद कर लाते हैं और फिर दस गुना ज्यादा दाम पर नश से ग्रस्त लोगों को बेच देते हैं। यानी यह एक अलग तरह का गोरखधंधा शुरू हो गया है। इस धंधे में जुटे युवा आमतौर पर सरकारी अस्पताल और नशा मुक्ति केंद्रों के आसपास मंडराते रहते हैं।

हैरानी की बात यह है कि नशा मुक्ति अभियान चलाने वाली पुलिस की नजर इस अवैध धंधे पर क्यों नहीं जाती है! जबकि यह उतना ही खतरनाक है जितना परंपरागत नशे की तस्करी कर बेचने का धंधा। यह काला कारोबार बड़े पैमाने पर फैल चुका है और बड़ी मछलियों पर कभी कोई हाथ नहीं डालता। दवा के नाम पर नशे का जो ये धंधा चल रहा है, इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। नशा मुक्ति के नाम पर युवाओं को नशे की गर्त में धकेला जा रहा है।

नशे के कई रूप हैं। अभी एक सबक केरल से मिला है। वहां डिजिटल तरीके से नशे के एक नए रूप का पता चला है। इसमें नौजवानों से लेकर उम्रदराज लोग तक शामिल हैं। यह एक नई ‘डिजिटल लत’ है। आनलाइन ऐसे खेल शुरू किए गए हैं, जिनमें एक रात में वारे-न्यारे करने की बात होती है। शुरू-शुरू में इन खेलों का प्रचार करने के लिए बड़ी हस्तियों को लाया गया। मगर जब बात खुली, तो उन पर कानूनी शिकंजा कसा गया। बेशक आनलाइन शिक्षा के जरिए विद्यार्थियों के पास पढ़ाई का कारगर विकल्प है।

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अभिभावक समझते हैं कि बच्चे आनलाइन पढ़ाई में व्यस्त हैं। मगर बच्चे तो ऐसे आभासी खेलों में लगे हुए हैं कि जिसमें वारे न्यारे तो कम होते हैं, उल्टे इसमें सब गंवाने के बाद वे अवसाद में चले जाते हैं। अब तो आत्महत्या की खबरें भी आने लगी हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। केरल पूर्ण शिक्षित राज्यों में से एक है। वहां डिजिटल साक्षरता भी स्वाभाविक रूप से ज्यादा है। मगर वहां भी स्थिति बिगड़ रही है।

ऐसा नहीं कि ऐसी खबरें दिल्ली या पंजाब से नहीं आतीं, लेकिन केरल में बड़े पैमाने पर डिजिटल लत बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक जब इस लत के शिकार बच्चों से बात करते हैं, तो उन्हें उबारने में कोई ज्यादा सफलता नहीं मिल पाती है। क्योंकि एक सप्ताह में काफी पैसे मिलने का लोभ उन पर बुरी तरह हावी रहता है। ऐसे में इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि इस जाल को किस तरह तोड़ा जाए। यह डिजिटल खेल नशे की लत की तरह गहरा होता है। इसके लिए ‘इंटरनेट एडिक्शन टेस्ट’ जरूरी है। इस लत के स्तर का पता कर इससे ग्रस्त युवाओं को रचनात्मक विकल्प देकर उन्हें उबारने की कोशिश की जा सकती है।

किसी के लिए यह कहना कि वह डिजिटल नशे का शिकार हो गया है, बहुत कठिन है। हर व्यक्ति मोबाइल या इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है। भारत की डिजिटल ताकत पर सरकार भी गर्व करती है। अब इसी ताकत के बूते हम 5जी से 6जी की यात्रा तय कर रहे हैं। इसके साथ ही कृत्रिम मेधा की नई दुनिया भी नौजवानों के सामने खुल रही है। इस साइबर दुनिया में वे काले कारोबार की अंतरराष्ट्रीय मंडियों से भी जुड़ जाते हैं। फिर उनके लोभ की सीमा बढ़ जाती है। देश में अब यह डिजिटल लत एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। कैसे इन युवाओं को इस नशे की लत से बाहर निकाला जाए, यह एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि आभासी मंचों का जाल इस तरह से हमारे समाज में फैल गया है कि किसी को डिजिटल नशे से ग्रस्त कहना बहुत कठिन है।

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दूसरी ओर, जब नौजवान कुछ खतरनाक खेलों को डिजिटल शक्ति के साथ खेलते हैं, तो प्राय: हार जाने पर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसे युवा तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। ऐसे में हमें समस्या की तह में जाना होगा। केवल परंपरागत नशे को ही देश की युवा पीढ़ी को बर्बाद करने वाला मान लेना, यथार्थ से आंखें मूंद लेने जैसा है। लिहाजा नशे के हर रूप और उसके हर स्तर से देश को निपटना होगा। चिट्टे और हेरोइन से लेकर अवैध शराब तक, जिसकी भट्ठियां पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक लगी नजर आती हैं। यह तो खतरनाक है ही, लेकिन इससे भी अधिक खतरनाक है डिजिटल नशा। इससे बड़ी संख्या में युवा प्रभावित हो रहे हैं।

माता-पिता बच्चे की आनलाइन पढ़ाई पर भरोसा कर लेते हैं और दूसरी ओर बच्चे अपनी बर्बादी की राह पर चल रहे होते हैं। उन्हें लगता है कि पढ़ने-लिखने की अब क्या जरूरत, जब वे इन डिजिटल खेलों से अपनी जेबें भर सकते हैं। केरल ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से लिया है। वहां कुछ केंद्र भी बनाए गए हैं। असल में पढ़ाई और इंटरनेट के इस्तेमाल में संतुलन बहुत जरूरी है। इस संतुलन के लिए बच्चों के साथ अभिभावकों का भी मार्गदर्शन आवश्यक है। इसको लेकर केंद्र और राज्य सरकारों को एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। ऐसे नशा मुक्ति केंद्र खोलने चाहिए जहां डिजिटल खेल से सभी को आगाह किया जाए, युवाओं को असलियत समझाई जाए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इस समस्या के बेकाबू होने से युवा पीढ़ी को बचाना और कठिन हो जाएगा।