स्त्री-पुरुष में अंतर है इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन एक श्रेष्ठ और दूसरा हीन है, यह मानना गैरबराबरी का सूचक है। शारीरिक अंतर होना प्राकृतिक है जबकि सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर मनुष्य द्वारा निर्मित है। इसी पृष्ठभूमि में हाल में घटी कुछ घटनाएं ध्यान खींचती हैं। एक, महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में एक महिला चार सौ पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए 28 नवंबर को रात मंदिर में प्रवेश कर गई और उसने शनि महाराज को तेल चढ़ाया। उसके इस कृत्य पर बवाल मच गया और मूर्ति को अपवित्र मानते हुए मंदिर प्रशासन ने शुद्धीकरण के तहत शनि प्रतिमा का दूध से अभिषेक किया और पूरे मंदिर को धोया। दो, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक गांव में एक महिला को भैंस चोरी के आरोप में पांच जूते मारे गए और साठ हजार रुपए जुर्माना लगाया गया। तीन, केरल के एक सुन्नी शिक्षाविद् ने कहा कि लैगिंक समानता ऐसी चीज है जो कभी वास्तविकता में तब्दील होने वाली नहीं है, यह इस्लामी तालीम के खिलाफ है और बौद्धिक रूप से गलत है।
महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर नहीं हो सकतीं, वे केवल बच्चे पैदा करने के लिए होती हैं, महिलाएं संकट की स्थितियों का सामना नहीं कर सकती। नौकरी में पचास प्रतिशत आरक्षण इनके लिए बहुत ज्यादा है। इन प्रघटनाओं की विवेचना जरूरी है। सवाल है कि क्या महिलाओं का मंदिर में प्रवेश संविधान में निहित मूल्यों के विपरीत है? क्या इससे यह तय नहीं होता कि पुरुष सत्ता का धार्मिक नेतृत्व महिलाओं की पवित्रता और अपवित्रता को सुनिश्चित करता है? और क्या महिलाओं का प्रवेश धार्मिक स्थलों को अपवित्र कर देता है? न्यायपालिका और जाति पंचायत समान प्रकृति की संरचनाएं अगर नहीं हैं तो भारतीय ग्रामीण परिवेश में विभिन्न आरोपों को स्थापित कर महिलाओं को सार्वजनिक रूप से सजा देने का अधिकार क्या अपराध नहीं है ? यह केवल जाति केंद्रित नहीं है, धर्म भी इसमें कहीं न कहीं भूमिका निभाता है। धार्मिक शिक्षक आज भी अपनी बेतुकी बातें उड़ेले जा रहे हैं और कोई उन्हें रोकनेवाला नहीं है।
‘द ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स 2014’ की रिपोर्ट के अनुसार नाबलिग लड़कियों की तस्करी में हमारे देश में लगभग 65 फीसद इजाफा हुआ है, जो शर्मनाक है। ऊपर की घटनाएं भले ही अलग दिखती हों, लेकिन उनमें कुछ समानताएं नजर आती हैं। ये प्रघटनाएं गांधीजी के इस कथन पर प्रश्नचिह्न लगाती नजर आती हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि महिला पुरुष की वह सहचर है, जिसके पास समान बौद्धिक क्षमता है। अगर सशक्त होने का अभिप्राय नैतिक शक्ति से है तब निर्विवाद रूप से महिला पुरुष से श्रेष्ठ है। …मानवीय होने का नियम अहिंसा है तो फिर इस नियम का भविष्य महिला के हाथ सुरक्षित है।
इन सभी घटनाओं में पुरुषों की केंद्रीय भूमिका है। धार्मिक विश्वास पितृसत्तात्मक विचारधारा के रूप में महिलाओं की अधीनता को वैधता प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं के पुजारी बनने, मासिक धर्म और प्रसव काल के दौरान पवित्र स्थलों पर उसके प्रवेश करने को वर्जित माना गया है। देखा जाए तो उक्त तीनों घटनाएं धर्म के आधार पर पारस्परिक रूप से संबद्ध हो जाती हैं और हर स्थिति में धर्म से जुड़े विभिन्न पक्षों की पुरुष के द्वारा व्याख्या और विवेचना उसे सामाजिक क्षेत्र में कमोबेश पराभौतिकीय शक्ति बना देती है। पुरुष हर देवी-देवता की आराधना कर सकता है, लेकिन महिला ऐसा नहीं कर सकती। श्मशान स्थल पर महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है (कुछ अपवादों को छोड़कर)। विवाह के उपरांत महिला को सामान्यतौर अपना उपनाम परिवर्तित करना पड़ता है। यज्ञ इत्यादि कृत्यों में पति की उसके साथ उपस्थिति अनिवार्य है।
अविवाहिता, विधवा और विवाहिता के संदर्भ में व्यवहार प्रतिमान धर्म के संदर्भ में विशिष्ट हैं, जो कहीं न कहीं पवित्रता-अपवित्रता के सिद्धांत से जुड़ जाते हैं। इस समूचे संदर्भ में इस विमर्श की भी चर्चा होनी चाहिए कि कौन किसकी प्रकृति को तय करता है यानी क्या पुरुष-सत्तात्मकता धर्म और जाति को आकार देती है? क्या धर्म के द्वारा जाति और पुरुष-सत्तात्मकता विशिष्ट अर्थ ग्रहण करती है? और क्या जाति की निरंतरता इसलिए है क्योंकि उसे धर्म और पुरुष-सत्तात्मकता से समर्थन प्राप्त है?
धर्म, जाति और पारिवारिक दायित्वों को केंद्र में रखकर महिलाओं के उत्पीड़न और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर न देने के निर्णय को पुरुषसत्ता वैधता प्रदान करती है। तो क्या यह माना जाए कि एक राष्ट्र-राज्य में पुरुष, महिलाओं और एक स्तर तक बच्चों के लिए लोकतंत्र के भिन्न-भिन्न अर्थ हैं और मूलभूत अधिकार जाति, लिंग और आयु केंद्रित अवधारणाएं हैं। इन पक्षों को समाजशास्त्रीय विमर्श के केंद्र में लाए जाने की आवश्यकता है। आज के दौर में समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र और साहित्य का अध्ययन अधूरा है जब तक उनमें सभी पक्षों की चर्चा न की जाए। नारीवादी कार्यकर्ता कमला भसीन का मानना है कि अगर औरत खाना पका सकती है तो पुरुष भी पका सकता है, क्योंकि खाना पकाने के लिए बच्चेदानी की जरूरत नहीं होती। एक और विचारक मेरी वूलस्टोनक्रॉफ्ट कहती हैं कि अगर स्त्री को पुरुष के समान शिक्षा दी जाए तो समाज में भी वे समान अवसर प्राप्त कर लेंगी।
क्या वास्तव में ऐसा हो पाया है? मौजूदा समय में हमारे देश में महिला साक्षरता की दर 65.46 प्रतिशत है जो कि स्वाधीनता के प्रारंंिभक वर्षों यानी 1951 में 8.86 प्रतिशत थी यानी शिक्षा की दर में तो वृद्धि हुई, लेकिन स्त्री-पुरुष समानता आज भी एक भ्रम है। फिर यह समानता कैसे लाई जा सकती है? आज भी भारतीय नागरिक इस मानसिकता से स्वतंत्र नहीं हो सके हैं कि अच्छे कर्मों से पुत्र जन्म और बुरे कर्मो से पुत्री जन्म के जुड़ाव हैं। भारतीय समाज में पुत्र जन्म की अकांक्षा ही बालिका भ्रूण हत्या की वजह बना जाती है। यह तीनों मामले बताते हैं कि पुरुषसत्ता के सरगना आज भी महिलाओं को समझा रहे हैं कि वह अपवित्र है। उसने जातिगत परंपराओं का उल्लंघन किया है। उसका दर्जा पुरुष के मुकाबले दोयम है।
