63 साल की उम्र में सैनी रैनीवेल सात, शकरपुर आइटीओ पुल पर दिल्ली सरकार से मदद की उम्मीद लगाए हुए हैं। सैनी अकेले नहीं है जो बाढ़ की भयावहता के शिकार हैं। सब्जी की खेती कर जीवन यापन करने वाले सैनी का परिवार छत के लिए भटक रहे हैं।

दिल्ली सरकार ने प्लास्टिक की छतरी के नाम पर सिर्फ सर्वे का ढोंग रचा है। 50 साल के महेश, 65 साल की महारानी और 70 साल के रामबती कहती है कि जितना उन्हें याद है, ऐेसा पानी बहुत कम ही देखा है। लेकिन पहली बार उन्हें भोजन के लाले पड़ रहे हैं।

महावीर, रेखा, सोनकली, ब्रजनंदन और हीरा लाल कहते हैं कि स्वच्छ पानी भी पीने को नसीब नहीं हो रहा। दिल्ली सरकार की गाड़ियां दो किलोमीटर दूर लगती है और जब तक वहां बाल्टी, डब्बा लेकर जाते हैं, पानी समाप्त हो चुका होता है। यही हालत भोजन का भी है। सरकार ने भोजन देने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की है।

सर्वे होता है कि बहुत जल्द आपके लिए अनाज आएगा लेकिन बाद में पता चलता है कि जितना राशन आया था वह पहले ही समाप्त हो चुका। जिन्हें नहीं मिला उन्हें भी मिलेगा लेकिन कब तक, यह समय निर्धारित नहीं है। बाढ़ पीड़ित लोगों के बीच अखिल भारतीय संयुक्त मोर्चा नामक संगठन के कार्यकर्ता सक्रिय दिखे। दवाई और राशन का बंदोबस्त कैसे हो और बाहर से आने वाला अनाज उचित तरीके से सबके पास पहुंच जाए, इसके लिए मोर्चा के अध्यक्ष पवन कुमार जैसे अन्य लोग यहां सक्रिय दिखे।

रिक्शा चलाकर और सब्जी की खेती के अलावा लक्ष्मीनगर, शकरपुर और मयूर विहार जैसे इलाके में घरों में काम कर गुजर करने वाली महिलाएं भी लाचार हो गई हैं। 65 साल की अंकिला और 55 साल के महादेव सैनी टैंट में बैठकर अपने भोग्य को कोस रहे हैं। वे कहते हैं कि उनकी पूरी जिंदगी यहीं कट गई।

यमुना में वे सब्जी और अमरूद की खेती करते हैं और सालों से यहीं झुग्गियों में रहकर गुजारा करते है। लेकिन इस बार पानी नहीं उन्हें भी अंदर से हिला दिया है। इस उम्र में अब अपने मूल घर बिहार जाना भी उन्हें नागवार लग रहा और यही कारण है कि अब भगवान के भरोसे अपनी जिंदगी को यहीं पानी हटाने और छतरी के नीचे सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं की मदद पर छोड़ दिया है।