महिलाओं के खतने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में मांग की गई है कि महिलाओं के खतने पर देश में पूर्ण रुप से प्रतिबंध लगे और इसे एक गैर-संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए। वहीं इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि महिलाओं की जिंदगी सिर्फ पति और बच्चों के लिए ही नहीं है, बल्कि उनकी अन्य इच्छाएं भी हो सकती हैं। पति के प्रति समर्पण ही महिला का कर्तव्य नहीं है। किसी भी समाज में ऐसी रुढियों का चलन किसी की व्यक्तिगत गोपनियता का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि ये व्यवस्था भले ही धार्मिक हो, लेकिन पहली नजर में यह प्रथा महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है। याचिका पर सुनवाई के दौरान देश के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने भी महिलाओं के खतने का विरोध करते हुए याचिका का समर्थन किया। इससे पहले केन्द्र सरकार ने कहा था कि इसके लिए दंड विधान में 7 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है। बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समाज में आम रिवाज के रुप में प्रचलित इस इस्लामी प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए केरल और तेलंगाना सरकारों को नोटिस भी जारी किया था।
बता दें कि महिलाओं के जननांग में क्लिटोरिस नामक अंग होता है, जो कि महिलाओं की सेक्शुएलटी से जुड़ा होता है। इंटरकोर्स के दौरान महिलाओं की संतुष्टि के लिए क्लिटोरिस की काफी अहमियत होती है। लेकिन बोहरा मुस्लिम समुदाय में खतने की प्रक्रिया के दौरान क्लिटोरिस को काटकर अलग कर दिया जाता है। खतना मासूम बच्चियों का किया जाता है। कई मामलों में बच्चियां खतने के दर्द को नहीं सह पातीं और अत्यधिक खून बह जाने की वजह से उनकी सेहत के लिए गंभीर स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। यही वजह है कि अब महिलाओं के खतने के विरोध में आवाजें उठ रही हैं।

