कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच में सीएम कुर्सी को लेकर तकरार जारी है। इस बीच डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार सीएम सिद्धारमैया के आवास नाश्ते के लिए पहुंचे। माना जा रहा है कि आलाकामान के हस्तक्षेप के बाद ही दोनों नेता मिलने को राजी हुए हैं। इस बैठक से पहले एक सोशल मीडिया पोस्ट में सिद्धारमैया ने साफ कर दिया था कि अगर हाईकमान उन्हें दिल्ली बुलाएगा तो वे जाएंगे।
वैसे कुछ दिन पहले डीके ने अपनी पोस्ट में साफ कर दिया था कि वे सीएम बनने की इच्छा रखते हैं, उन्होंने लिखा था कि अपना वचन निभाना दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। चाहे वह कोई जज हो, राष्ट्रपति हो या मैं खुद ही क्यों न हूं। सभी को अपने कहे पर अमल जरूर करना चाहिए। वचन की शक्ति ही विश्व शक्ति है।
इस पोस्ट के थोड़ी देरी बाद सीएम सिद्धारमैया ने कहा था कि किसी शब्द की कोई शक्ति तब तक नहीं होती जब तक वह लोगों के लिए बेहतर दुनिया न बना दे। कर्नाटक के प्रति हमारा वचन अडिग है। इस जुबानी जंग के बीच बीजेपी नेताओं ने कहा है कि बहुमत परीक्षण होना चाहिए। कर्नाटक बीजेपी नेता सुनील कुमार ने अविश्वास प्रस्ताव की मांग कर दी है। कुछ दावे यह भी किए जा रहे हैं कि डी.के. शिवकुमार बगावत कर कई कांग्रेसी विधायकों को तोड़ सकते हैं।
शिवकुमार के समर्थन में कितने विधायक?
डी.के. शिवकुमार कितने विधायकों पर प्रभाव रखते हैं, इस पर कोई आधिकारिक या स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालाँकि खुद शिवकुमार के समर्थक दावा कर रहे हैं कि उनके पास करीब 100 से ज्यादा विधायकों का समर्थन है।
कर्नाटक विधानसभा का गणित
कर्नाटक विधानसभा में कुल 224 सीटें हैं। किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए 113 सीटें चाहिए। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 135 सीटों पर जीत मिली थी। बीजेपी तमाम कोशिशों के बावजूद केवल 66 सीटें जीत पाई। वहीं जनता दल (सेक्युलर) के खाते में 19 सीटें गईं।
अब यदि बीजेपी और जेडीएस की सीटें जोड़ दी जाएं तो कुल मिलाकर 85 सीटें बनती हैं। इसका मतलब है कि यह गठबंधन बहुमत से 28 सीटें दूर है। अगर किसी तरह 28 सीटें जुड़ती हैं, तो बीजेपी–जेडीएस गठबंधन 113 के बहुमत तक पहुंच सकता है।
क्या डी.के. शिवकुमार बगावत कर सकते हैं?
पूरा समीकरण तभी बदल सकता है अगर डी.के. शिवकुमार कांग्रेस से नाराज़ होकर बगावत करें। अगर वह करीब 30 विधायकों को अपने साथ कर लेते हैं, तो कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार हो सकती है मगर जन प्रतिनिधि कानून के अनुसार किसी भी दल में वैधानिक रूप से अलगाव के लिए दो-तिहाई विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है।
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