21 जून की तारीख थी, साल था 1948। आजादी को अभी एक साल भी नहीं हुए थे। तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने ही मंत्रिमंडल के सहयोगी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पत्र लिखकर जानकारी दी थी कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान के रूप में गाया जाना संभव नहीं है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि इसकी धुन ऑर्केस्ट्रा या बैंड के अनुकूल नहीं है।

नेहरू ने मुखर्जी को लिखे पत्र में यह भी कहा, ‘चूंकि वंदे मातरम की धुन अनुकूल नहीं है वहीं दूसरी ओर जन गण मन को भारत के साथ-साथ विदेशों में भी काफी सराहा गया है। और इसका संगीत भारत या विदेश में इसे सुनने वाले लोगों के लिए काफी आकर्षक है।’

नेहरू ने पत्र में लिखा, ‘वंदे मातरम निस्संदेह हमारे संपूर्ण राष्ट्रीय संघर्ष से गहराई से जुड़ा हुआ है और हम सभी भावनात्मक रूप से इससे जुड़े हुए हैं और आगे भी जुड़े रहेंगे। यह किसी भी स्थिति में एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय गीत के रूप में बना रहेगा, लेकिन मेरा व्यक्तिगत विचार है कि जो गीत स्वतंत्रता की तीव्र लालसा का प्रतिनिधित्व करता है, वह आवश्यक रूप से स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ मेल नहीं खाता। जन गण मन में विजय और संतुष्टि का एक तत्व है। लेकिन मुख्य बात इसका संगीत है।’

जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे मुखर्जी

दरअसल मुखर्जी के पत्र का उत्तर नेहरू दे रहे थे जिसमें उन्होंने कहा था कि जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में अपनाने के कैबिनेट के अस्थायी निर्णय पर कई मामलों में व्यक्त की गई भावनाओं को देखते हुए सरकार को एक प्रेस रिलीज जारी करना चाहिए। इस मामले पर कोई गलतफहमी नहीं होने की बात कहते हुए नेहरू ने मुखर्जी से कहा कि ‘हमारा निर्णय था कि जन गण मन को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रगान के रूप में तब तक प्रयोग किया जाना चाहिए जब तक कि संविधान सभा द्वारा अंतिम निर्णय नहीं लिया जाता।’

दिल्ली: इंडिया गेट पर प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन में लगे हिडमा के समर्थन में नारे, पुलिस पर फेंका पेपर स्प्रे, FIR दर्ज

नेहरू और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच हुए इस पत्राचार की पूरी जानकारी जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि (जेएनएमएफ) द्वारा नेहरू आर्काइव पर सार्वजनिक किए जाने की बाद सामने आई है। दरअसल जेएनएमएफ ने नेहरू से संबंधित 77,000 पृष्ठों और 35,000 दस्तावेजों को  ऑनलाइन और ऑफलाइन मुफ्त में उपलब्ध कराए गए है। नेहरू आर्काइव, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की 136वीं जयंती के अवसर पर हाल ही में लांच किया गया 100 खंडों वाला एक संग्रह है।

कांग्रेस सरकार में मिलता था फंड

अपने भारतीय और विदेशी समकालीनों के साथ उनके पत्राचार से लेकर चीन-भारत सीमा युद्ध, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संबंधों और कई नीतिगत मुद्दों पर उनके विचारों तक, यह संग्रह नेहरू पर एक अंतिम आधिकारिक और प्रमाणित संसाधन है।

यूपी में एसआईआर के काम में लापरवाही पर कड़ा एक्शन, नोएडा-दादरी से लेकर बहराइच तक एफआईआर दर्ज

यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार के दौरान जेएनएमएफ को सरकारी धन प्राप्त हुआ था, जिसका अंतिम अनुदान 2013-14 में मिला था, जब उसे नेहरू के चुनिंदा खंडों के लिए 5 करोड़ रुपये मिले थे। जेएनएमएफ ने 1983 में तीन मूर्ति मार्ग पर तारामंडल का निर्माण भी किया था, लेकिन 2004-05 में इसे नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय – को दे दिया। जिसे अब पीएमएमएल कहा जाता है।