पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में जीत का परचम लहराने और 25 साल से सत्तासीन सीपीएम का किला उखाड़ने से गदगद बीजेपी की खुशी करीब दो महीने बाद ही फीकी पड़ने लगी है। पार्टी और सरकार में अनबन शुरू हो गई है। पिछले कुछ दिनों से अपने उल्टे-पुल्टे बयानों से मीडिया की सुर्खियों में आए सीएम बिप्लब देव अब पार्टी की भी नजरों में चुभने लगे हैं। हालांकि, उनकी सरकार पर किसी तरह का कोई खतरा फिलहाल नहीं है। सीएम बिप्लब देव इस सप्ताह दिल्ली में ही डेरा जमाए रहे और राज्य का हालात से पार्टी नेताओं को अवगत कराते रहे। बता दें कि बिपल्ब देव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संयुक्त सचिव कृष्ण गोपाल की पसंद थे। आरएसएस के इस पुराने प्रचारक ने दो साल पहले ही देव को त्रिपुरा के लिए चुना था और सीपीएम के खिलाफ राज्य में बीजेपी का प्लॉट तैयार करने के लिए राजी किया था। गोपाल नॉर्थ-ईस्ट में एक दशक से लंबे समय तक संघ के प्रचारक के रूप में कार्यरत रह चुके हैं।
न्यूज 18 के मुताबिक बिप्लब देव के सामने समस्या त्रिपुरा चुनाव जीतने के बाद शुरू होने लगी, जब त्रिपुरा के बीजेपी प्रभारी और संघ के पूर्व प्रचारक सुनील देवधर ने देव की जगह जिंशुदेव बर्मन को सीएम पद के लिए अपनी पसंद बताया। हालांकि, पार्टी आलाकमान ने उनकी पसंद को अंतिम घड़ी में डिप्टी सीएम का पद दे दिया पर बिप्लब देव को ही सीएम बनाया क्योंकि चुनाव से पहले ही संघ और बीजेपी राज्य में सीएम चेहरे को लेकर बिप्लब के नाम पर सहमत थे। इसके बावजूद पार्टी में कमोबेश दरार बरकरार रही।
हालांकि, त्रिपुरा फतह के बाद करीब एक महीने तक सुनील देवधर ने अगरतल्ला से दूरी बना ली थी और राजनीतिक दरार को प्रकट होने नहीं दिया लेकिन हाल के दिनों में जैसे ही बिप्लब देव अपने बयानों से आलोचनाओं का शिकार होने लगे, बीजेपी की त्रिपुरा इकाई में फिर से सीएम के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी। सीएम के खेमे के सूत्रों के मुताबिक उनके विरोधी खेमे के कुछ नेताओं ने भी सोशल मीडिया पर सीएम बिप्लब देव के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की है। फिलहाल पार्टी आलाकमान कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं। लिहाजा, माना जा रहा है कि 15 मई के
बाद बीजेपी त्रिपुरा बीजेपी में आए शुरुआती संकट से निपटने की कोशिश करेगी, वर्ना सीपीएम को फिर से वहां पांव पसारने का मौका मिल सकता है।
