छह दिन हुए उस खौफनाक घटना के, लेकिन इलाके के लोग अब भी सहमे हुए हैं। पिछले हफ्ते संदिग्ध उल्फा उग्रवादियों ने नंदलाल शाह और उनकी बेटी काजोल को गोलियों से उड़ा दिया था। असम के तिनसुकिया से तकरीबन पचास किलोमीटर बिजुलीबान में यह वारदात हुई थी। मृतकों का कसूर यही था कि वे गैरअसमिया हिंदीभाषी थे।
आतंकवादी पूरे परिवार को गोलियों से उड़ाना चाहते थे। उनके हमले में शाह परिवार के चार लोग घायल हो गए थे। इस हिंसा के बाद तिनसुकिया जिले में बंद रखा गया था और स्थानीय लोग चाहते हैं कि उनकी सुरक्षा के लिए सरकार कदम उठाए, हालांकि गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि असम के हिंदीभाषियों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी।
उल्फा उग्रवादियों के हमले में घायल लोगों का इलाज डिब्रूगढ़ के अस्पताल में चल रहा है। नंदलाल (65) के बेटे ललन शाह (28) ने बताया कि मेरी आंखों के सामने मेरे पिताजी को गोली मारी गई। गोलियों से छिदा, तड़पता उनका शरीर आज भी जैसे मेरी आंखों के सामने है। मैं वह दृश्य नहीं भूल सकता। उन्होंने कहा कि हमारे घर की दीवारों पर गोलियों के निशान देखिए। मेरी 18 साल की बहन काजोल को जो गोली मारी गई, वह मिट्टी की दीवार और छप्पर को छेदकर पार कर गई थी।
शाह ने बताया कि उन्होंने किसी तरह पैसे की मांग नहीं की। उन्होंने बस दरवाजे पर दस्तक दी और कहा कि वे फौजी हैं और एक गिलास पानी मांगा। मेरे पिताजी ने उन्हें बैठने के लिए बेंच दी। इसके बाद उन्होंने गोलियों की बौछार कर दी और पूरे घर में गोलियां बरसाईं। घर में फर्श पर फैले खून के धब्बे अब भी देखे जा सकते हैं।
इस क्षेत्र में उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लोगों की अच्छी खासी तादाद है। ये लोग कई पीढ़ियों से यहां बसे हैं। शाह परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जलालपुर कस्बे का है। ललन शाह का कहना है कि उनके बाबा हरद्वारी प्रसाद शाह 1920 में असम आए थे। ललन के पिता का जन्म यहीं हुआ और बाद में सबकी पढ़ाई असमिया माध्यम से हुई।
ललन ने कहा कि हिंदीभाषियों पर पहले भी हमले हुए थे। 2003 और 2007 में हिंदीभाषियों पर हुए हमले में बारह लोग मारे गए थे। तब कई घरों को आग लगा दी गई थी। लेकिन आतंकियों के डर से किसी परिवार ने घर नहीं छोड़ा। हम यहां इसलिए यहां हैं कि कि हमारे पास और कोई ठिकाना नहीं है। अब हमारा नाता बिहार या यूपी से नहीं है, अब हम यहीं के हैं। हम कहीं नहीं जाने वाले।
शाह परिवार की गांव में साइकिल मरम्मत और किराने की छोटी-सी दुकान है। इसके अलावा दुकान चार बीघा जमीन है। ललन शाह के भई लखन ने कहा कि 19 लोगों का पेट भरना इतना आसान काम नहीं है। अब भगवान ही हमारी देखभाल कर सकता है।
हालांकि इस इलाके में पुलिस की गश्त जारी है और लोग अपने रोजमर्रा के कामों में लग गए हैं। पास के एक दुकानदार बिस्वनाथ महतो कहते हैं, यह एक भयानक घटना थी । उन्होंने बताया कि उनके पिता 1940 में बिहार से यहां आए थे। उनके बेटे सुरेश का कहना है कि बिहार में हमारा पुरखों से अब कोई संबंध नहीं रहा। अब हम पूरी तरह असमिया बन चुके हैं।
आज के हालात पर अफसोस जताते हुए बिस्वनाथ कहते हैं कि ‘मैंने असमिया स्कूल में पढ़ाई की, बाद में मेरे पांच बच्चों ने भी यही पढ़ाई की। अब मेरे पोते-पोती भी असमयिा स्कूलों में पढ़ रहे हैं। लेकिन कुछ लोग अब भी हमें बाहरी समझते हैं।’
इस बीच पुलिस प्रवक्ता ने कहा है कि हमने पूछताछ के लिए दो लोगों को पकड़ा गया है। हालांकि अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

