सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में पक्षकार ‘राम लला विराजमान’ की ओर से बुधवार को दलील दी गई कि श्रद्धालुओं की अटूट आस्था ही अयोध्या में विवादित स्थल के राम की जन्म भूमि होने का सबूत है।
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष ‘राम लला विराजमान’ की ओर से पूर्व अटार्नी जनरल के परासरन ने कहा कि राम जन्मभूमि खुद ही मूर्ति का आदर्श बन चुकी है और यह हिंदुओं की उपासना का प्रयोजन है। इससे पहले अदालत ने इस विवाद में सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़े से जानना चाहा कि विवादित स्थल पर अपना कब्जा साबित करने के लिए क्या उसके पास कोई राजस्व रिकार्ड और मौखिक साक्ष्य है।
परासरन ने संविधान पीठ से सवाल किया कि इतनी सदियों बाद भगवान राम के जन्म स्थल का सबूत कैसे पेश किया जा सकता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रहे संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।
परासरन ने पीठ से कहा-वाल्मीकि रामायण में तीन स्थानों पर इस बात का जिक्र है कि अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था। उन्होंने कहा, इतनी सदियों के बाद हम यह कैसे साबित कर सकते हैं कि इसी स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था। इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि क्या इस तरह के किसी धार्मिक व्यक्तित्व के जन्म के बारे में पहले कभी किसी अदालत में इस तरह का सवाल उठा था।
पीठ ने पूछा-क्या बेथलेहम में ईसा मसीह के जन्म जैसा विषय दुनिया की किसी अदालत में उठा और उस पर विचार किया गया। इस पर परासरन ने कहा कि वे इसका अध्ययन करके अदालत को सूचित करेंगे। इससे पहले अदालत ने इस विवाद में सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़े से जानना चाहा कि विवादित स्थल पर अपना कब्जा साबित करने के लिए क्या उसके पास कोई राजस्व रिकार्ड और मौखिक साक्ष्य है। पीठ ने निर्मोही अखाड़े की ओर से वरिष्ठ वकील सुशील जैन से कहा कि चूंकि वे इस समय कब्जे के बिंदु पर हैं, इसलिए हिंदू संस्था को अपना दावा साबित करना होगा।
संविधान पीठ ने कहा-अभी, हम कब्जे के मुद्दे पर हैं। आपको अपना कब्जा साबित करना है। यदि आपके पास अपने पक्ष में कोई राजस्व रिकार्ड है तो यह आपके पक्ष में बहुत अच्छा साक्ष्य है। निर्मोही अखाड़ा विभिन्न आधारों पर विवादित स्थल पर देखभाल करने और मालिकाना हक का दावा कर रहा है। अखाड़े का कहना है कि यह स्थल प्राचीन काल से ही उसके कब्जे में है और उसकी हैसियत मूर्ति के संरक्षक की है।
पीठ ने जैन से सवाल किया- राजस्व रिकार्ड के अलावा आपके पास और क्या साक्ष्य है और कैसे आपने अभिभावक के अधिकार का इस्तेमाल किया। जैन ने इस तथ्य को साबित करने का प्रयास किया कि इस स्थल का कब्जा वापस हासिल करने के लिए हिंदू संस्था का वाद परिसीमा कानून के तहत वर्जित नहीं है। यह वाद परिसीमा कानून, 1908 के अनुच्छेद 47 के अंतर्गत आता है। यह संपत्ति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के तहत मजिस्ट्रेट के कब्जे में थी। परिसीमा की अवधि मजिस्ट्रेट के अंतिम आदेश के बाद शुरू होती है। चूंकि मजिस्ट्रेट ने कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है, इसलिए कार्रवाई की वजह जारी है, अत: परिसीमा द्वारा वर्जित होने का कोई सवाल नहीं उठता है।
[bc_video video_id=”5971541336001″ account_id=”5798671092001″ player_id=”JZkm7IO4g3″ embed=”in-page” padding_top=”56%” autoplay=”” min_width=”0px” max_width=”640px” width=”100%” height=”100%”]
उन्होंने कहा कि हमारा वाद तो मंदिर की देखभाल के लिए संरक्षक के अधिकार की बहाली का है और इसमें प्रबंधन और मालिकाना अधिकार भी शामिल है। उन्होंने कहा कि 1950 में जब कब्जा लिया गया तो अभिभावक का अधिकार प्रभावित हुआ और इस अधिकार को बहाल करने का अनुरोध कब्जा वापस दिलाने के दायरे में आएगा। जैन ने कहा कि कब्जा वापस लेने के लिए परिसीमा की अवधि 12 साल है। हमसे कब्जा लेने की घटना 1950 में हुई। इस मामले में 1959 में वाद दायर किया गया और इस तरह से यह समय सीमा के भीतर है।
निर्मोही अखाड़े ने मंगलवार को इस प्रकरण में बहस शुरू करते हुए कहा था कि 2.77 एकड़ की सारी विवादित भूमि उसके नियंत्रण में थी और 1934 से इस स्थान पर मुसलमानों को प्रवेश की इजाजत नहीं थी। संविधान पीठ अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीनों पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांटने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के सितंबर, 2010 के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई कर रही है। इस विवाद का मध्यस्थता के माध्यम से सर्वमान्य समाधान खोजने के प्रयास विफल होने के बाद संविधान पीठ ने छह अगस्त से सारी अपीलों पर नियमित आधार पर सुनवाई शुरू की है।

