आतंकी फंडिंग के मामले में चार आरोपियों को बरी करते हुए दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार को कहा है कि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि ‘घी’ कोडवर्ड का इस्तेमाल विस्फोटक और ‘खिदमत’ का इस्तेमाल आतंकियों की सहायता करने के लिए किया जाता था। एनआईए ने मोहम्मद सलमान, मोहम्मद सलीम, आरिफ गुलाम बशीर धर्मपुरिया और मोहम्मद हुसैन मोलानी को पाकिस्तानी आतंकी संगठन से फंडे लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
आरोप था कि ये चारों फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन (FIF) से फंड लेकर स्लीपर सेल को तैयार करते थे जिससे कि भारत में दहशत फैलायी जा सके। एनआईए ने कहा था कि एक मस्जिद बनाने के नाम पर यह फंड लिया गया था। मोहम्मद सलमान के फोन से मिले दो संदेशों को एनआईए ने चार्जशीट में शामिल किया था। इसमें से एक मेसेज था, ‘घी का इंतजाम हो गया है, बॉम्बे वाली पार्टी भी आएगी…उनके हाथों भिजवा देंगे।’
दूसरा मेसेज था, ‘आप खिदमत में थे इसलिए आपको नहीं पता है।’ एनआईए ने इन शब्दों को जो मतलब निकाला था, उसे चार्जशीट में शामिल किया था। एजेंसी का कहना था कि ये लोग आतंकियों को सुविधा मुहैया कराने की बात कर रहे थे। हालांकि स्पेशल जज प्रवीण सिंह ने इन आरोपियों को बरी कर दिया। उन्होंने कहा, ‘इन शब्दों के पारे में कोई सबूत नहीं पेश किया जा सका है। इसके कई और भी मतलब निकल सकते हैं। इसलिए एनआईए की इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता।’
घी के बारे में एनआईए के वकील ने कोर्ट में कहा था कि इसका कोई संदर्भ नहीं है इसलिए इस शब्द का इस्तेमाल किसी और अर्थ में किया गया है। यह विस्फोटक भी हो सकता है। लेकिन बाद में कोर्ट ने कहा कि घी का मतलब कुछ और भी हो सकता है। इसे विस्फोटक से जोड़ देना भी तर्कसंगत नहीं है। इसी तरह खिदमत शब्द पर भी बहस हुई।
इन दो शब्दों के अलावा भी एनआईए ने फोन पर हुई बात से कुछ संदिग्ध शब्दों को निकाला था। हालांकि कोर्ट ने कहा कि शब्दों के अर्थ का अंदाजा लगाना, सबूत नहीं है। इसलिए इन आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
