एक अपराधी द्वारा जेल में लिखी गई कविताओं के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने का फैसला किया है। कोर्ट ने पाया कि दोषी व्यक्ति द्वारा लिखी गई कविताओं से पता चलता है कि व्यक्ति को अपने किए पर पछतावा है और अब उसमें सुधार आ गया है। जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ‘जेल में लिखी गईं कविताओं से पता चलता है कि उसे (दोषी व्यक्ति) अपनी गलती का एहसास हो गया है, जो कि उसने तब की थी, जब वह काफी युवा था। अब उसमें सुधार आ गया है।’ खबर के अनुसार, सुरेश बोरकर नामक व्यक्ति को एक बच्चे के अपहरण और उसकी हत्या के मामले में मौत की सजा सुनायी गई थी। दोषी व्यक्ति पिछले 18 सालों से जेल में बंद है और अब सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मौत की सजा को बदलकर उम्रकैद में तब्दील कर दिया है।

दोषी व्यक्ति की मौत की सजा उम्रकैद में बदलते हुए बेंच ने कहा कि ‘दोषी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए हम यह नहीं मान पा रहे हैं कि यह अपराध दुर्लभतम श्रेणी का अपराध है। कोर्ट ने कहा कि अपराध करते समय दोषी व्यक्ति की उम्र 22 साल थी और अब वह जेल में अपने अपराध के लिए 18 साल बिता चुका है। इस दौरान उसका व्यवहार अच्छा रहा है और वह कोई प्रोफेशनल किलर भी नहीं है। दोषी, सभ्य बनकर फिर से समाज में शामिल होने की कोशिश कर रहा है।’ बता दें कि दोषी व्यक्ति ने जेल में रहते हुए ही ग्रेजुएशन किया है, साथ ही वह गांधी रिसर्च फाउंडेशन द्वारा चलाए जा रहे गांधी विचारों की ट्रेनिंग भी कर रहा है।

दोषी व्यक्ति की तरफ से कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दोषी 18 साल जेल में काट चुका है और जो गलती उसने की उसे उसका सबक भी मिल चुका है। जेल में रहने के दौरान उसने जो कविताएं लिखी हैं, उनसे उसकी मनोस्थिति के बारे में पता चलता है कि उसे अपने किए पर पछतावा है। गौरतलब है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा फांसी की सजा मिलने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में दोषी की फांसी की सजा बरकरार रखी थी। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने सजा में बदलाव करते हुए इसे उम्रकैद में तब्दील कर दिया है।