गर्भपात कानून के एक प्रावधान का लाभ देते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक बलात्कार पीड़िता को अपने 24 हफ्ते पुराने ‘असामान्य’ भ्रूण का गर्भपात कराने की सोमवार (25 जुलाई) को इजाजत दे दी। पीड़िता को इस आधार पर इजाजत दी गई कि गर्भावस्था जारी रहने से उसका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा-5 के तहत कानून में दी गई अपवाद की स्थिति का लाभ पीड़िता को दिया। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा-5 के तहत यह प्रावधान है कि यदि गर्भ से मां की जिंदगी को गंभीर खतरा हो तो 20 हफ्तों के बाद भी गर्भपात कराया जा सकता है।
न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ ने कहा, ‘मेडिकल बोर्ड ने राय दी है कि गर्भावस्था जारी रहने से मां का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य गंभीर खतरे में पड़ जाएगा। हम मेडिकल राय से संतुष्ट हैं और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा-5 के मुताबिक गर्भावस्था खत्म करने के लिए इसकी अनुमति दी जा सकती है।’ पीठ ने कहा, ‘हम याचिकाकर्ता को छूट देते हैं और यदि वह गर्भपात कराना चाहती है तो उसे इसकी अनुमति दी जाती है।’ सुनवाई के दौरान, मुंबई स्थित किंग एडवर्ड मेमोरियल कॉलेज एवं अस्पताल के सात सदस्यीय मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में पीठ को सौंपी गई।
न्यायालय ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने 24 हफ्ते पुराने इस भ्रूण में गंभीर खराबियां पाई हैं और राय दी है कि यदि गर्भावस्था जारी रही तो मां की जिंदगी गंभीर खतरे में पड़ सकती है। पीठ ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने सिफारिश की है कि गर्भावस्था खत्म की जा सकती है। केंद्र की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा-5 के तहत अपवाद की एक स्थिति है और कानून की धारा-3 के तहत 20 हफ्ते के गर्भ की सीमा इस मामले में लागू नहीं होगी, क्योंकि मां की जिंदगी को गंभीर खतरा है। रोहतगी ने यह भी कहा कि इस मामले में एक व्यापक मुद्दा निहित है जिस पर अलग से विचार किया जा सकता है। इस पर पीठ ने कहा कि मां और भ्रूण की जान को गंभीर खतरा होने के बावजूद 20 हफ्ते से ज्यादा पुराने गर्भ को खत्म करने पर पाबंदी लगाने वाले गर्भपात कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती के व्यापक मुद्दे पर वह पीठ विचार करेगी जहां इस मुद्दे पर ऐसी ही याचिका लंबित है।
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उच्चतम न्यायालय ने 22 जुलाई को मेडिकल बोर्ड को महिला की मेडिकल जांच कर रिपोर्ट अदालत में दाखिल करने का निर्देश दिया था। इससे पहले न्यायालय ने बलात्कार पीड़िता की अर्जी पर केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा था। याचिकाकर्ता ने गर्भपात कानून के उन प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी थी जो मां और भ्रूण की जान को खतरा होने के बाद भी 20 हफ्ते से ज्यादा पुराना गर्भ खत्म करने की इजाजत नहीं देते। अपनी याचिका में महिला ने आरोप लगाया है कि शादी का झांसा देकर उसके पूर्व-मंगेतर ने उससे बलात्कार किया, जिससे वह गर्भवती हो गई। महिला ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा 3-2-बी को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की थी, क्योंकि यह 20 हफ्ते से ज्यादा पुराने भ्रूण के गर्भपात पर पाबंदी लगाती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि यह सीमा तय करना अतार्किक, मनमाना, कठोर, भेदभावपूर्ण और जीवन एवं समानता के अधिकारों का उल्लंघन है।
