सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद से जुड़ी याचिका को संविधान पीठ के हवाले करने से इनकार कर दिया है। इससे पहले वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कोर्ट में दलील दी कि मुस्लिमों में प्रचलित बहु-विवाह प्रथा से ज्यादा बड़ा अयोध्या विवाद है, इसलिए पहले उसे संविधान पीठ को सौंपा जाए। इसके बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने कहा कि मामले में सभी पक्षों को सुनने के बाद ही उसे संविधान पीठ को सौंपने पर फैसला किया जाएगा। बता दें कि राजीव धवन बहु-विवाह प्रथा केस में मुस्लिम पक्ष के पैरवीकार हैं।
राजीव धवन ने पीठ से कहा, ‘‘अयोध्या भूमि विवाद मुस्लिम समुदाय में प्रचलित बहुविवाह प्रथा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है और पूरा राष्ट्र इसका जवाब चाहता है।’’ गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के बहुमत के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई कर रही है। इससे पहले, कोर्ट ने श्याम बेनेगल और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोगों की इस मामले में हस्तक्षेप करने की उम्मीदों पर यह कहते हुये पानी फेर दिया था कि सबसे पहले मूल विवाद के पक्षकारों को ही बहस करने की अनुमति दी जायेगी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ के इस विवादित स्थल को इस विवाद के तीनों पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और भगवान राम लला के बीच बांटने का आदेश दिया था। इस बीच, उत्तर प्रदेश के सेन्ट्रल शिया वक्फ बोर्ड ने इस विवाद के समाधान की पेशकश करते हुए न्यायालय से कहा था कि अयोध्या में विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल्य इलाके में मस्जिद का निर्माण किया जा सकता है। उससे उलट एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि मुस्लिम उसी विवादित स्थल पर मस्जिद बनाएंगे। हाल के दिनों में श्री श्री रविशंकर भी सभी पक्षों के बीच सुलह कराने की कोशिश करते दिखे थे।
