सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ ने गुरुवार (27 सितंबर) को 158 साल पुराने व्यभिचार कानून के अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। आईपीसी की धारा 497 के तहत अब विवाहेत्तर संबंध आपराधिक नहीं होंगे। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया है। डी वाई चंद्रचूड़ का इस केस से गहरा रिश्ता है क्योंकि 33 साल पहले उनके पिता और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ ने इसे जायज बताया था और इसे अपराध की श्रेणी में रखा था लेकिन 33 साल बाद उनके ही बेटे ने उसे पलट दिया।
पांच जजों की पीठ ने आम राय से फैसला सुनाते हुए एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया मगर कहा कि यह संबंध खत्म करने का आधार बन सकता है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि किसी महिला का पति उसका स्वामी या मालिक नहीं हो सकता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि धारा 497 महिलाओं की यौन स्वतंत्रता को बाधित करते है। बता दें कि 158 साल पुराने इस कानून के तहत पति की अनुमति के बिना किसी गैर मर्द से शारीरिक संबंध बनाने को अपराध करार दिया गया था। केरल के एक एनआरआई जोसेफ शाइन ने इस धारा को की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सीजेआई ने कहा कि चीन, जापान, ब्राजील में व्यभिचार अपराध नहीं है।
इससे पहले भी डी वाई चंद्रचूड़ ने अपने पिता द्वारा निजता के अधिकार पर 1976 में दिए गए फैसले को पलट दिया था और पिछले साल उसे मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखा था। उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार मानने से इनकार कर दिया था। वाई वी चंद्रचूड़ उस खंडपीठ के सदस्य जज थे। उस वक्त एएन राय चीफ जस्टिस थे। डीवाई चंद्रचूड़ के पिता वाई वी चंद्रचूड़ फरवरी 1978 से जुलाई 1985 तक देश के मुख्य न्यायाधीश थे।
