बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखक सलमान रश्दी ‘सांप्रदायिकता के जहर के प्रसार और देश में बढ़ती असहिष्णुता’ के खिलाफ जहां लेखकों के बढ़ते विरोध प्रदर्शन में सोमवार को शामिल हो गए, वहीं पहली बार एक रंगकर्मी भी अपना संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार लौटाते हुए इस मुहिम का हिस्सा बन गई हैं। रंगकर्मी माया कृष्ण राव ने दादरी की घटना और देश में व्यापक रूप से बढ़ रही असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कार लौटा दिया।
इस बीच कई और लेखकों ने अपना साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है। अब तक हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार कृष्णा सोबती सहित कम से कम 16 लेखक पुरस्कार लौटाने के अपने फैसले की घोषणा कर चुके हैं। अकादेमी पुरस्कार लौटाने और कार्यकारिणी बोर्ड या दूसरे पदों से लेखकों के इस्तीफा देने से साहित्य अकादेमी का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी के मद्देनजर अकादेमी ने 23 अक्तूबर को कार्यकारिणी बोर्ड की बैठक बुलाई है, ताकि इस मसले को बोर्ड के सामने रखा जा सके। हालांकि यह आशंका जताई जा रही है कि तब तक कुछ और लेखक अपना इस्तीफा दे सकते हैं, क्योंकि यह सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा।
रश्दी ने कहा- मैं नयनतारा सहगल और कई दूसरे लेखकों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन करता हूं। भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरनाक समय। उदय प्रकाश के बाद जवाहर लाल नेहरू की भानजी और अंग्रेजी लेखिका नयनतारा सहगल ने असहमति की आवाज उठाने पर लेखकों और अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ताओं पर बार-बार हमले को लेकर अकादेमी की चुप्पी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया था।
कश्मीरी लेखक गुलाम नबी ख्याल, उर्दू उपन्यासकार रहमान अब्बास, कन्नड़ लेखक और अनुवादक श्रीनाथ डीएन (अनुवाद पुरस्कार), मंगलेश डबराल और राजेश जोशी समेत सात और लेखकों ने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है। श्रीनाथ के साथ ही कवि डबराल और जोशी ने सोमवार को कहा कि वे अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा देंगे। वहीं वरयाम संधु और जीएन रंगनाथ राव ने अकादेमी को अपने फैसले की सूचना दे दी है। ख्याल ने भी कहा कि आज देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित और डरा हुआ महसूस कर रहे हैं। लेखकों ने चेतावनी देते हुए कहा- सांप्रदायिकता का जहर देश में फैल रहा है और लोगों को बांटने का खतरा बढ़ा है।
लेखकों के पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू होने के बाद साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने पिछले कुछ दिनों में यह स्पष्ट कहा है कि अकादेमी लेखकों के साथ है और कट्टरवाद के विरुद्ध है। वह विचार के आधार पर किसी भी लेखक की हत्या की निंदा करती है। उर्दू लेखक रहमान अब्बास ने कहा- दादरी घटना के बाद उर्दू लेखक समुदाय बेहद नाखुश है। इसलिए मैंने पुरस्कार लौटाने का फैसला किया। कुछ और उर्दू लेखक भी हैं जो विरोध में शामिल होना चाहते हैं। यही समय है कि हमें अपने आसपास हो रहे अन्याय के प्रति खड़े होना चाहिए।
कलबुर्गी हत्याकांड पर अकादेमी की चुप्पी का विरोध करते हुए जारी संयुक्त बयान में लेखक डबराल और जोशी ने कहा कि पिछले लगभग एक साल से लोकतंत्र के आधारभूत मूल्यों-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अपनी इच्छानुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता पर- हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से हमला किया जा रहा है जो स्वीकार्य नहीं है। लेखकों ने कहा कि अकादमी को सार्वजनिक तौर पर कलबुर्गी की हत्या का विरोध करना चाहिए था। गुजरात निवासी लेखक गणेश देवी सहित छह लेखकों ने एलान किया है कि वे अपने-अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं।
इस बीच रंगकर्मी माया कृष्ण राव ने भी दादरी की घटना और देश में व्यापक रूप से बढ़ रही असहिष्णुता के विरोध स्वरूप अपना संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार लौटा दिया। दिल्ली में रहने वाली रंगकर्मी माया ने नागरिकों के अधिकारों के लिए बोलने में सरकार की नाकामी को लेकर निराशा जताई। उन्होंने कहा है- तर्कवादियों, रचनात्मक कलाकारों, चिंतकों, विरोधियों, कार्यकर्ताओं को धमकियों का सामना करना पड़ा है और यहां तक कि उनकी हत्या कर दी गई। दादरी में सुनियोजित और दुर्भावनापूर्ण अफवाह फैलाई गई। फिर एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। सरकार इस तरह की परेशान करने वाली घटनाओं में नागरिकों के अधिकारों के लिए बोलने में विफल रही है। संगीत नाटक अकादेमी की सचिव हेलेन आचार्य को लिखे पत्र में राव ने अपनी निराशा प्रकट की है।
उन्होंने कहा- समाज की ओर से बार-बार याद दिलाए जाने के बावजूद मौजूदा सरकार ने लोगों के अभिव्यक्ति, विचार और अपने तरीके से स्वतंत्र देश में रहने के अधिकार के लिए खड़े होने को लेकर बहुत कम प्रयास किया। राव ने कहा- प्रधानमंत्री ने सिर्फ राष्ट्रपति की ओर से दिए बयान पर सहमति जताई, जबकि उन्होंने उन घटनाओं के बारे में कुछ नहीं कहा जो देश में हो रही हैं।

