जहां से कोरोना के संक्रमण की शुरुआत हुई, उस चीन के वुहान में बहुत लंबी और सख्त पूर्ण बंदी की गई। चार चरण में 76 दिनों की। उसका असर दिखा, लेकिन जल्द ही दोबारा संक्रमण के मामले सामने आए। ऐसे में दुनिया में अपनाए जा रहे पूर्णबंदी के मॉडल को अंतिम विकल्प नहीं माना जा रहा। अभी दुनिया के बाकी देशों में पूर्णबंदी के प्रभाव सामने नहीं आए हैं, लेकिन यह जरूर है कि इस महामारी से निपटने में फौरी तौर पर दुनिया के तमाम देशों के सामने पूर्ण बंदी को छोड़कर दूसरा कोई विकल्प नहीं दिख रहा। अब आर्थिक-सामाजिक वजहों से भारत समेत तमाम देशों के सामने कई सवाल उठ खड़े हुए हैं-पूर्ण बंदी को खत्म कैसे करें, क्या पूर्णबंदी की कुछ पाबंदियां खत्म की जाएं, क्या हो वह फार्मूला जिससे जान भी बचे और जीने का जरिया भी। क्योंकि, पूर्ण बंदी में ढील दिए जाने या इसे खत्म किए जाने पर सरकार के सामने कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने और लोगों को बचाने की चुनौती बड़े रूप में सामने होगी। जाहिर है, कोरोना से निपटने की लड़ाई लंबी चलने वाली है। इस आशय के संकेत मिलने लगे हैं।

पूर्णबंदी और हटाने के तरीके
चीन के वुहान के जिस मॉडल पर अमल किया जा रहा है, वहां पूर्णबंदी से संक्रमण के मामलों में 80 से 90 फीसद की गिरावट आई। लेकिन पूर्ण बंदी में ढील से वहां मामले दोबारा आए। जाहिर है, संक्रमण के मामले कम होने का मतलब यह नहीं कि सामान्य जीवन शुरू हो जाए। भारत के मामले में कई जानकारों ने राय दी है कि पूर्णबंदी खत्म किए जाने पर हालात विस्फोटक हो सकते हैं। अभी संवेदनशील क्षेत्र (हॉट स्पॉट और कंटेनमेंट एरिया) घोषित कर कम से कम मामलों पर निगाह रखी जा रही है।

जानकारों की राय में पूर्णबंदी रखते हुए कुछ ऐसी पाबंदियां हटाई जा सकती हैं, जिन्हें हटा लेने से बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में पाबंदियों को तीन श्रेणियों में बांट कर उन्हें हटाए जाने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। पहली, कम जोखिम वाली पाबंदी। दूसरी, इससे थोड़ी ज्यादा संभावना और तीसरी, जो न लागू हो तो संक्रमण का खतरा होगा ही। कम जोखिम वाली पाबंदी मसलन बाहर निकलकर कसरत करना। भारत समेत कुछ देशों में इस पर भी पाबंदी है। दूसरी तरह की पाबंदियां जिन्हें हटाने पर विचार किया जा सकता है, वो हैं गैर-जरूरी खरीददारी पर से रोक हटा देना या फिर घर से बाहर जमा होगा। सबसे जोखिम वाली पाबंदियां मानी जा रही हैं- वर्क फ्रॉम होम को खत्म करना, स्कूल-कॉलेज खोलना या फिर पृथक वास को खत्म करना।

चिकित्सकीय विकल्प और डब्लूएचओ
जानकारों की राय में अगर टेस्ट से संक्रमण का पता चला, लेकिन रक्त में एंटीबॉडी मौजूद है कि चिंता की बात नहीं। लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता यह है कि दुनिया में एंटीबॉडी की जानकारी देने वाला सही टेस्ट मौजूद ही नहीं है। ऐसे में दो विकल्प बचते हैं। पहला यह कि विषाणु का प्रभाव कम दिखे, तभी पूर्ण बंदी खत्म करने की सोची जाए। दूसरा, अगर टीका तैयार कर लिया जाए। तब फिर सुरक्षित दूरी की जरूरत नहीं रह जाएगी। लेकिन टीका बनाने में एक साल से ज्यादा का वक्त लग सकता है।

ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने पूर्ण बंदी के दूसरे चरण की बात करते हुए तीन एल का फॉर्मूला सुझाया है। डब्लूएचओ ने लाइफ (जीवन), लाइवलीहुड (जीविका) और लिविंग (जीना) की बात कही है। पूर्ण बंदी के भारत मॉडल के संदर्भ में डब्लूएचओ के विशेष दूत डेविड नाबरो ने कहा है कि दूसरे चरण में बीमारी के प्रसार को रोकने की कोशिशों के साथ लोगों की आजीविका भी सुनिश्चित करनी होगी। प्रधानमंत्री जान और जहान- दोनों की बातें कह चुके हैं।

पूर्णबंदी का अगला चरण
पूर्णबंदी के अगले चरण में अधिक जोखिम वाले इलाकों की पहचान की जाएगी। नाबरो ने सुझाव दिया है कि ऐसे इलाकों में पूर्णबंदी को पहले से अधिक सख्त बनाते हुए उस पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा और आंकड़े जुटाने होंगे। भारत में पूर्णबंदी बढ़ेगी। हालांकि, कम जोखिम वाले इलाकों या जहां संक्रमण नहीं है, वहां पर आर्थिक विकास को रफ्तार देने वाले काम शुरू होंगे। वहीं जहां अधिक जोखिम है, वहां सख्ती और बढ़ेगी। चीन के अनुभवों के आधार एक नया शोध कहता है कि ऐसे इलाकों की पहचान कर उन्हें बांटने में नए संक्रमण को लेकर ज्यादा सतर्क होना पड़ेगा और टीका सामने आने तक कई इलाकों को बंदी में रखना होगा। हांगकांग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोसेफ टीवू का कहना है कि सख्ती करने से संक्रमितों में कमी तो आई है, लेकिन दोबारा स्कूल खुलने, व्यापार और फैक्ट्री शुरू होने की वजह से मामलों में बढ़ोतरी आ सकती है।

संक्रमण की रफ्तार जिस तरह से बढ़ रही है, उससे लगता है कि संख्या में 10 गुनी ज्यादा बढ़ोतरी होगी। जनसंख्या के घनत्व और बदहाल स्वास्थ्य ढांचे के कारण हम नियंत्रण नहीं कर पा रहे। यह हिमस्खलन की तरह है। सरकार के सलाहकार इसे समझ नहीं पा रहे।- डॉ. टी जैकब जॉन, पूर्व प्रमुख, सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च इन वॉयरोलॉजी, आइसीएमआर

संक्रमण रोकने में भारत की बड़ी चुनौती इसका जनसंख्या घनत्व है। यहां प्रति वर्ग किलोमीटर में 422 लोग रहते हैं, जबकि चीन में 148 लोग। ऐसे में पूर्णबंदी में भी मामले बढ़ेंगे, रफ्तार बढ़ेगी, जैसा कि हो रहा है।- डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी, टीएच चान स्कूल आॅफ पब्लिक हेल्थ, हार्वर्ड विश्वविद्यालय