सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में हिंदू व्यक्ति को संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति में अपने हिस्से को वसीयत के जरिए किसी को भी देने की व्यवस्था की है। न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और अजय रस्तोगी की पीठ ने गुरुवार को मामले में यह फैसला दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू उत्तराधिकारी कानून 1956 की धारा 30 हिंदू पुरुष को अधिकारी देती है कि वह संयुक्त परिवार की संपत्ति में अपने अविभाजित हिस्से को परिवार में किसी भी सदस्य के नाम कर सकता है।
दरअसल, यह मामला तब शुरू हुआ जब कर्नाटक के हनुमे पटेल गौड़ा की दूसरी पत्नी की बेटी ने 1976 में संपत्ति विभाजन का मामला दायर किया। गौड़ा की 1965 में मृत्यु हो चुकी थी। जिसके बाद उनकी संपत्ति पहली पत्नी और उनके बच्चों के हिस्से में आई थी। कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान पहली पत्नी ने बताया कि गौड़ा ने 1962 में अविभाजित हिस्सा उन्हें दे दिया था। दूसरी पत्नी ने वसीयत को चुनौती दी और कहा कि बीमार गौड़ा को प्रभावित करके वसीयत लिखावाई गई थी। मगर, कोर्ट ने पाया कि धारा 68 के तहत वसीयत दुरुस्त थी। ट्रायल कोर्ट ने इसमें अविभाजित हिस्से की संपत्ति के वितरण पर ऐतराज किया और कहा कि हिंदू पर्सनल लॉ इस पर प्रतिबंध लगाता है। अदालत ने दूसरी पत्नी और बेटी को संपत्ति में 1/10वां हिस्सा देने का आदेश दिया।
फैसले को गौड़ा के पहली पत्नी के बेटे ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा-30 स्पष्ट करती है कि हिंदू वसीयतकर्ता अपनी किसी भी संपत्ति का बंटवारा कर सकता है। फैसले की व्याख्या में कहा गया है कि वितरण पुरुष उत्तराधिकारी के पक्ष में ही होगा। लिहाजा, 1/10वां हिस्सा दूसरी पत्नी और बेटी को नहीं दिया जा सकता। जिसके बाद फैसले को दूसरी पत्नी की बेटी ने सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दी थी। मगर सुप्रीम कोर्ट ने यही फैसला सुनाया है।

