केन्द्र की मोदी सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं की बात करें तो उसमें उज्जवला योजना यकीनन शुमार होगी। केन्द्र सरकार ने लोगों को खासकर ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण से बचाने और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) कनेक्शन बांटे थे, लेकिन हालिया एक रिसर्च में पता चला है कि इस योजना से प्रदूषण घटाने का लक्ष्य हासिल करना काफी मुश्किल लग रहा है। टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार, रिसर्च में पता चला है कि जिन लोगों को उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिले हैं, उनमें से बहुत कम लोग ही सिलिंडर दोबारा से भरवाते हैं और आमतौर पर सिलिंडर खत्म होने के बाद फिर से चूल्हे का रुख कर लेते हैं।

बता दें कि मई, 2016 में केन्द्र की मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की शुरुआत की थी। राष्ट्रीय स्तर पर शुरू की गई इस योजना के तहत सरकार ने साफ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय मदद, सब्सिडी और लोन के जरिए लोगों को स्टोव और एलपीजी सिलिंडर दिए गए थे। आंकड़ों के अनुसार, 7 करोड़ गरीब परिवारों को उज्जवला योजना के तहत बीते तीन सालों में स्टोव और सिलिंडर मिले हैं।

पर्यावरण और ऊर्जा पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपनी रिसर्च में बताया है कि सामान्य तौर पर 1000 में से 400 एलपीजी सिलिंडर मासिक तौर पर रिफिल कराए जाते हैं। जबकि उज्जवला योजना के तहत वितरित किए गए एलपीजी सिलिंडर्स में एक माह में 1000 में से सिर्फ 100 सिलिंडर ही रिफिल कराए जाते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर रिसर्च करने वाली टीम का आकलन है कि इस तरह से सरकार के प्रदूषण घटाने और महिलाओं को सांस संबंधी बीमारियों से बचाने का लक्ष्य हासिल करना बेहद मुश्किल काम है। हालांकि यह स्टडी सिर्फ अभी कर्नाटक के कोप्पल जिले में किए गए सर्वे पर आधारित है। माना जा रहा है कि देश के अन्य इलाको में भी हालात इससे कोई बहुत बेहतर नहीं होंगे।