दो महीने पहले ही इंदौर मेयर के हेल्पलाइन नंबर पर एक कॉल आई थी। अक्टूबर 15 को दिनेश भारती वर्मा ने भगीरथपुरा में स्थानीय मंदिर के पास मौजूद कुएं के पानी में कुछ तो गलत पाया था। उन्होंने तब बताया था कि बोरवेल के पानी में नाले का पानी मिल रहा है। मंदिर जो भी आते हैं, उन्हें साफ पानी की जरूरत है। इस एक शिकायत पर कोई एक्शन नहीं हुआ और नवंबर में एक बार फिर मदद की गुहार लगाई गई। इस बार इंदौर के वॉर्ड 11 की एक और निवासी शिवानी ठाकले ने दावा किया कि पानी में एसिड मिला हुआ है।

दिसंबर आते-आते हालात बेकाबू जैसे हो गए और लोग बीमार पड़ने शुरू हो गए। 18 दिसंबर को लोगों ने आरोप लगाया कि नर्मदा वॉटर सप्लाई में भयंकर दुर्गंध आ रही है। 28 दिसंबर को गणएश परसाकर और यश परवेना ने जनकारी दी कि उनके वॉर्ड में 90 फीसदी लोग बीमार पड़ चुके हैं, उल्टी, डायरिया और डीहाइड्रेशन की शिकायत है। इसके बाद दिसंबर 29 को जब इसी दूषित पानी की वजह से पहली मौत हुई, प्रशासन की नींद टूटी। इस दूषित पानी की वजह से भागीरथपुरा में आठ लोगों की मौत हो चुकी है, 200 अस्पताल में भर्ती हैं। शुरुआती जांच के बाद कहा जा रहा है कि ड्रिकिंग वॉटर पाइपलाइन के ऊपर क्योंकि एक टॉयलेट का निर्माण कर दिया गया, उस वजह से पानी दूषित हुआ। प्रशासन ने अभी आधिकारिक तौर पर सिर्फ चार मौतों की पुष्टि की है, 212 अस्पताल में भर्ती हैं।

अब नगर निगम का डेटा खंगालने पर पता चलता है कि तमाम शिकायतों के बाद भी प्रशासन ने कोई एक्शन नहीं लिया और उसी वजह से अब ये मौतें हो रही हैं। पिछले साल इंदौर में दूषित पानी को लेकर 266 शिकायतें दर्ज की गई थीं। वहां भी जोन 4 जहां पर भागीरथपुरा भी आता है, वहां से 23 शिकायतें सामने आईं। यहां भी अस्सिटेंट इंजीनियर योगेश जोशी को पिछले एक साल में दूषित पानी की 16 शिकायतें मिली थीं, पांच तो सुलझा दी गईं, बची सात को बिना कुछ एक्शन लिए क्लोज कर दिया गया।

जांच करने पर पता चलता है कि इस दूषित पानी से जो मौतें हो रही हैं, उससे कई महीने पहले ही नई नर्मदा वॉटर पाइपलाइन डालने की तैयारी चल रही थी। अधिकारियों ने अपनी तरह से स्पॉट चेक कर लिया था, टेंडर निकाला गया था। 12 नवंबर 2024 को ही फाइल तैयार कर ली गई थी। बड़ी बात यह है कि इस परियोजना के अंतिम चरण को लागू करने का कार्य आदेश 26 दिसंबर 2025 को जारी किया गया, ठीक उसी समय जब मौतों की खबरें सामने आने लगीं।

अब इन मौतों पर कॉरपोरेटर कमल वघेला ने भी चुप्पी तोड़ी है। उन्हीं के कार्यक्षेत्र में भागीरथपुरा भी आता है, वे बताते हैं कि नर्मदा वॉटर पाइपलाइन डालने का फैसला पिछले साल ही किया गया था। उसके बाद एक फाइल भी तैयार की गई। लेकिन वघेला के मुताबिक उस फाइल को सात महीनों तक ठंडे बस्ते में रखा गया। हालात ऐसे बन गए कि वाघेला को मुख्यमंत्री मोहन यादव को चिट्ठी लिखनी पड़ी। उस चिट्ठी में उ्होंने बताया कि तमाम शिकायतों के बाद भी अधिकारियों ने सिर्फ इतना कहा कि काम अभी अंडर प्रोसेस चल रहा है।

अब वाघले कहते हैं कि जो मौतें हो रही हैं, ये कोई प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि यह घटना केवल प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि गंभीर आपराधिक लापरवाही का नतीजा है, जिसने जानबूझकर जनस्वास्थ्य को खतरे में डाला। प्रथम दृष्टया यह मामला कर्तव्य में घोर लापरवाही, आदेशों की अवहेलना और जनस्वास्थ्य कानूनों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

वैसे इसी इलाके के वॉटर इनचार्ज बबलू प्रसाद बताते हैं कि भगीरथपुरा में जो हुआ है वो इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी चूक है। एक ऐसा इलाका जहां सड़कें सर्फ 10-12 फीट चौड़ी हैं। उनके मुताबिक जब उन्होंने तीन साल पहले इस एरिया में काम शुरू किया, सीवेज सिस्टम पहले ही बर्बाद हो चुका था। उनकी माने तो टेंडल तो आ चुका था, लेकिन अधिकारियों ने एक्शन नहीं लिया। इसके ऊपर नई पाइप लाइन की दरकार थी, लेकिन कभी उन्हें बदला नहीं गया।

अब जब इतनी मौतें हो रही हैं, अधिकारी भी बयानबाजी पर उतर आए हैं। एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहते हैं कि ये कहना गलत होगा कि पाइपलाइन बदलने के लिए कोई काम नहीं किया गया। तीन लाइनें हैं- मेन लाइन, डिस्ट्रिब्यूशन लाइन और हाउसहोल्ड लाइन। केंद्र की अमृत 2.0 योजना के साथ मिलकर पाइपलाइन का काम शुरू कर दिया गया है। अधिकारी के मुताबिक जिस टेंडर को लेकर आज सवाल उठ रहे हैं वो कई महीनों पहले ही दे दिया गया था। इसके ऊपर अमृत योजना के तहत भी पाइपलाइन पर काम चल रहा है। फिर ऐसे में टेंडर पर काम कैसे शुरू किया जा सकता है, जबकि इससे वित्तीय अनियमितता की आशंका पैदा होती है?

सिसोनिया आगे दूषित पानी का कारण बताते हुए कहते हैं कि हमारी जांच में सामने आया है कि मुख्य पाइपलाइन के ऊपर एक छोटी पुलिस चौकी का निर्माण किया गया था। वहां एक शौचालय बना हुआ था, लेकिन उसमें सेफ्टी टैंक नहीं था, जिससे सारा दूषित कचरा एक गड्ढे में जमा हो रहा था। उसी गड्ढे के नीचे मुख्य जल पाइपलाइन टूट गई थी, जिसके कारण पानी दूषित हो गया। हमने मौके से सैंपल लिए और जांच में पुष्टि हुई कि ये सैंपल दूषित थे और दस्त का कारण बन सकते हैं।

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