पिछले महीने शुभम गुप्ता को एक ‘अस्थायी पर्ची ‘मिली, जिससे पता चलता है कि उनका नाम ECHS योजना (Ex-Servicemen Contributory Health Scheme) में जुड़ गया है। इस योजना में फौजी अस्पतालों या चुने हुए अस्पतालों में इलाज मुफ्त मिलता है। कार्तिक शर्मा के लिए इस पर्ची का मतलब हर महीने इलाज के खर्च में 10,000 रुपये की बचत होना है। विक्रांत राज और किशन कुलकर्णी को भी ऐसी ही पर्ची मिली है। उन्होंने बताया कि जल्द ही इस अस्थायी पर्ची की जगह उन्हें आधिकारिक ECHS कार्ड मिल जाएगा।

ये युवा उन लगभग 500 ऑफिसर कैडेट्स में शामिल हैं, जिन्हें 1985 से अब तक देश के बड़े सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों से ट्रेनिंग के दौरान आई चोट या बीमारी के कारण छुट्टी दे दी गई थी। कई सालों तक उन्हें हर महीने मिलने वाली थोड़ी-सी मदद से ही इलाज कराना पड़ा, जो उनके बढ़ते मेडिकल खर्च के लिए काफी नहीं थी। लेकिन अब नया साल उनके लिए उम्मीद लेकर आया है।

अगस्त 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने इन युवाओं की परेशानी पर स्वत: संज्ञान लिया। यह कदम द इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबरों के बाद उठाया गया। इन खबरों में बताया गया था कि ये कैडेट्स गंभीर बीमारी या चोट से जूझ रहे हैं। इनके सपने टूट गए हैं और उन्हें पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। इसके कुछ ही दिनों बाद, रक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी किया और उन्हें ECHS की सुविधाएं देने का फैसला किया।

हालात सचमुच बदलते नजर आ रहे

कई वर्षों की निराशा के बाद अब हालात सचमुच बदलते नजर आ रहे हैं। इन कैडेट्स और उनके परिवारों ने बताया कि लंबे इंतजार के बाद उन्हें आखिरकार कुछ उम्मीद मिली है। साथ ही उन्होंने साफ कहा कि उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। वे दिव्यांग पेंशन और पूर्व सैनिक का दर्जा पाने के लिए अपना संघर्ष आगे भी जारी रखेंगे। इस पूरे मामले की सुनवाई फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चल रही है।

33 साल के शुभम ने बताया कि उन्हें नवंबर के पहले हफ्ते में ECHS कार्ड की पर्ची मिल गई थी।2014 में एनडीए की ट्रेनिंग के दौरान शुभम की गर्दन की रीढ़ में गंभीर चोट लग गई थी। इस चोट के कारण उनके चारों हाथ-पैर और शरीर का ऊपरी हिस्सा काम नहीं करता। शुभम ने कहा कि अभी उनकी हालत ठीक है। लेकिन अगर आगे चलकर उन्हें न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाने की जरूरत पड़ी, तो ईसीएचएस उनके लिए बहुत बड़ी मदद साबित होगा।

मुफ्त इलाज

ECHS योजना को 2003 में शुरू किया गया था। यह योजना पूर्व सैनिकों और उनके परिवार के लोगों को इलाज की सुविधा देती है। इसमें एलोपैथी और आयुष दोनों तरह का इलाज मिलता है। इलाज देश भर में बने पॉलीक्लिनिक, फौजी अस्पताल, सरकारी अस्पताल, और चुने हुए निजी अस्पतालों में किया जाता है। इस योजना का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है। मरीजों को इलाज के समय पैसे नहीं देने पड़ते।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, दिव्यांग कैडेट्स के लिए ईसीएचएस में लगने वाला योगदान शुल्क माफ कर दिया गया है। आमतौर पर रिटायर होने वाले अधिकारियों को इसके लिए एक बार में 1.2 लाख रुपये तक देने होते हैं, लेकिन इन कैडेट्स से यह राशि नहीं ली जाएगी।

इस योजना के तहत लाभ पाने वालों को फौजी अस्पतालों और चुने हुए अस्पतालों में बिना किसी खर्च और बिना इलाज की सीमा के सुविधा मिलती है। उम्र या बीमारी को लेकर कोई रोक नहीं है। अगर किसी आपात स्थिति में ऐसे अस्पताल में इलाज कराना पड़े जो सूची में नहीं है, तो सरकारी दरों के अनुसार पैसा वापस मिलता है। इसमें अस्पताल में भर्ती और बाहर का इलाज, जांच और दवाइयां शामिल हैं। इस योजना का लाभ पति या पत्नी और सभी योग्य परिवार के सदस्यों को भी मिलता है।

पूर्व कैडेट्स को क्या फायदा हुआ?

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले, ट्रेनिंग के दौरान दिव्यांग हुए इन कैडेट्स को ईसीएचएस योजना का लाभ नहीं मिलता था। अभी भी उन्हें दिव्यांग पेंशन नहीं मिलती, जबकि सेना में शामिल हो चुके लोगों को यह सुविधा मिलती है। इसके अलावा, इन कैडेट्स को अब तक पूर्व सैनिक का दर्जा भी नहीं दिया गया है।

27 साल के कार्तिक ने बताया कि 2021 में एनडीए की ट्रेनिंग के दौरान उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लग गई थी, जिससे उनके चारों हाथ-पैर काम नहीं करते। उन्होंने कहा कि पहले उनके परिवार को हर महीने करीब 40,000 रुपये इलाज पर खर्च करने पड़ते थे। ईसीएचएस की सुविधा मिलने के बाद यह खर्च करीब 10,000 रुपये कम हो गया है। कार्तिक ने बताया कि अभी कुछ दवाइयां चुने हुए अस्पतालों में नहीं मिल रही हैं, लेकिन उन्हें कहा गया है कि वे जल्द उपलब्ध हो जाएंगी। ऐसा होने पर इलाज का खर्च और भी कम हो जाएगा।

25 साल के किशन और 26 साल के विक्रांत (एनडीए के पूर्व कैडेट) ट्रेनिंग के दौरान मेडिकल कारणों से बाहर कर दिए गए थे, उनके परिवारों ने कहा कि ईसीएचएस में शामिल होना उनके लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आया है।

किशन की मां भारती (पूर्व शिक्षिका) ने बताया कि वे हर महीने उसकी दवाइयों और रोज लगने वाले इंजेक्शन पर 13,200 रुपये खर्च करती हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें हाल ही में ईसीएचएस की अस्थायी पर्ची मिली है। पिछली बार उन्होंने दवाइयां एक साथ ज्यादा मात्रा में खरीदी थीं, लेकिन अब ईसीएचएस मिलने से दवाइयों का खर्च कम हो जाएगा।

ट्रेनिंग के दौरान किशन को दिल का दौरा पड़ा था और उन्हें HIE की बीमारी हो गई थी। यह बीमारी दिमाग में ऑक्सीजन और खून की कमी से होती है। पिछले पांच सालों से उनके दिमाग की नसें धीरे-धीरे खराब हो रही हैं, जिस वजह से वे बिस्तर पर ही पड़े रहते हैं। उनकी देखभाल करने वाली केवल उनकी मां ही हैं।

विक्रांत के मामले में, द इंडियन एक्सप्रेस ने अगस्त में बताया था कि उनके इलाज पर हर महीने करीब 95,000 रुपये खर्च हो रहे थे, जबकि उन्हें हर महीने सिर्फ 40,000 रुपये की मदद मिलती थी। उनकी मां सुमन ने बताया कि उन्हें पिछले हफ्ते ईसीएचएस की अस्थायी पर्ची मिल गई है। उन्होंने कहा कि ईसीएचएस की सुविधा मिलने से विक्रांत के इलाज का खर्च काफी कम हो जाएगा। सुमन एक पूर्व वायुसेना अधिकारी की बेटी हैं।

पूर्व कैडेट लड़ रहा अधिकारों की लड़ाई

एनडीए के पूर्व कैडेट अंकुर चतुर्वेदी इन कैडेट्स के अधिकारों के लिए लगातार लड़ रहे हैं। अंकुर ने बताया कि अगस्त में रक्षा मंत्रालय का आदेश आने के बाद करीब 65 दिव्यांग ऑफिसर कैडेट्स ने ईसीएचएस कार्ड के लिए आवेदन किया है। इनमें से लगभग 41 आवेदनों की जांच पूरी हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक करीब 39 कैडेट्स को ईसीएचएस की अस्थायी पर्ची मिल चुकी है।

इस मामले में हुई प्रगति को लेकर द इंडियन एक्सप्रेस ने रक्षा मंत्रालय से सवाल पूछे थे, लेकिन मंत्रालय ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। अगस्त के बाद से इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में पांच सुनवाई हो चुकी हैं। अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को तय की गई है। कोर्ट ने इस मामले में एक एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कई अहम सुझाव भी दिए हैं:

  1. ट्रेनिंग के दौरान दिव्यांग हुए कैडेट्स को पूरा ईसीएचएस लाभ दिया जाए, ताकि वे अन्य पूर्व सैनिकों के बराबर हो सकें।
  2. ट्रेनिंग में घायल कैडेट्स को एकमुश्त मदद नहीं, बल्कि अधिकारी स्तर की दिव्यांग पेंशन दी जाए और उन्हें पूर्व सैनिक का दर्जा मिले।
  3. उन्हें पूरा पुनर्वास सहयोग दिया जाए, जैसे कृत्रिम अंग, फिजियोथेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य की मदद।
  4. दिव्यांग ऑफिसर कैडेट्स को बाहर करने के बजाय उनकी स्थिति की समय-समय पर जांच कर नॉन कॉम्बैट पदों पर काम दिया जाए। जैसे मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस, डिफेंस अकाउंट्स, डीआरडीओ, बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन या ऐसे अन्य विभाग।

रिपोर्ट तीनों सेनाओं को भेजी गई

अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि इन सभी सुझावों की जांच सेवा मुख्यालय द्वारा की जाए और अपनी सिफारिशें रक्षा मंत्रालय को भेजे। साथ ही अदालत ने कहा कि रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय मिलकर इन सिफारिशों पर विचार करें और अदालत को अपना जवाब दें।

द इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि यह रिपोर्ट तीनों सेनाओं को भेजी गई थी और सभी ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। अंकुर चतुर्वेदी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि एमिकस की रिपोर्ट और सेवा मुख्यालय की सहमति के बाद दिव्यांग पेंशन और लंबे समय की रोजगार सुरक्षा से जुड़ी मुख्य समस्या का समाधान जल्द हो जाएगा।

यह भी पढ़ें: ‘सैन्य सेवा में लंबे समय तक तनाव से हो सकता है कैंसर…’, पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका कर दी खारिज