धर्म निरपेक्षता व सांप्रदायिकता के विवाद के इस काल में मां विन्ध्यवासिनी की नगरी (विन्ध्याचल) के अल्पसंख्यक समुदाय के लोग मजहबी मेल मिलाप का संदेश दे रहे हैं। यह हिंदू मुसलिम एकता का अजब नजारा है। प्रदेश सरकार द्वारा विन्ध्याचल मंदिर के अधिग्रहण के प्रस्ताव पर स्थानीय पंडा समाज आंदोलन की राह पर हैं। अल्पसंख्यक लोग स्थानीय पंडों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर उनके साथ सड़क पर हैं। वे भी सरकार के इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

मालूम हो कि वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के साथ प्रसिद्ध सिद्ध पीठ विन्ध्याचल मंदिर के अधिग्रहण का प्रस्ताव है। प्रदेश सरकार के इस प्रस्ताव का विन्ध्याचल के पंडे व पुरोहित खिलाफत कर रहे हैं। पंडा समाज के लोग क्रमिक विरोध में बंदी, कालापट्टी व जुलूस आदि निकालकर सड़कों पर विरोध कर रहे हैं। उनके साथ स्थानीय मुसलिम समाज के लोग भी खुलकर हैं।

असल में प्रेम और सद्भाव से मां विन्घ्यवासिनी नगरी का ऐतिहासिक नाता है। यह मजहबी मेल मिलाप की मिसाल भी है। यहां हिंदुओं का प्रसिद्ध पीठ विन्ध्याचल है तो उससे लगा मुसलिमों का पवित्र कन्तित शरीफ भी है। दोनों स्थानों पर बराबर श्रद्धालुओं व जायरीनों की भीड़ रहती है। अलग-अलग धर्म के दो धार्मिक स्थल पास-पास होने के बाद भी यहां आज तक कोई घटना नहीं हुई जिससे सांप्रदायिक माहौल बिगड़े।

अयोध्या कांड के बाद भी यहां कोई सनसनाहट नहीं थी। कन्तित शरीफ के उर्स में तो पहली चादर हिंदुओं की ओर से चढ़ाने की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। ख्वाजा इस्माइल चिश्ती के इस दरगाह में उर्स की शुरुआत हिंदुओं द्वारा चढ़ाई गई चादर के बाद ही होता है। यहां एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं। नवरात्र मेले में मुसलिम समुदाय के लोगों की भागीदारी रहती है। उर्स में वहीं स्थिति हिंदुओं की होती है।

मंदिर अधिग्रहण के विरोध में चल रहे पंडों के आंदोलन में मुसलिम समाज की भागीदारी यहां की गंगा-जमुनी संस्कृति को और मजबूती दे रही है। पंडों के साथ मुसलिम समाज का युवा वर्ग खुलकर आगे है। पंडों में आंदोलन में शरीक रहे सोनव्वर व मोइनुद्दीन कहते हैं कि मंदिर का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए।

हजारों वर्षों से जो यहां की परंपरा रही है उसी का निर्वाह होना चाहिए। ऐसी ही कुछ बात अमानुल्लाह अन्सारी एडवोकेट व जावेद भी कहते हैं। मां विन्ध्यवासिनी देवी के धाम की मौजूदा समय में जो स्थिति है वैसी ही रहनी चाहिए। मंदिर के विकास व दर्शनार्थियों के बेहतर सुविधाओं के लिए अन्य विकल्प तलाशे जाने चाहिए। बहरहाल स्थानीय कन्तित शरीफ के मुसलिम देश को प्रेम का एक तस्वीर दिखा रहे हैं।