महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र के तीसरे दिन मंजीरे बजा कर कीर्तन करनेवाले विपक्षी दलों में गुरुवार को फूट पड़ गई और कीर्तन कलह में बदल गया। गुरुवार को किसानों के कर्ज माफी मुद्दे पर जहां कांग्रेस ने विधानसभा से वाकआउट किया वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के विधायकों ने सदन की कार्यवाही में भाग लिया।

राकांपा के विधायक विधान भवन की सीढ़ियों पर किए जानेवाले कांग्रेसी नेताओं के विरोध प्रदर्शन में भी शामिल नहीं हुए। राकांपा इस फूट का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ रही है। उसका कहना है कि कांग्रेस ने गोंदिया जिला परिषद अध्यक्ष के चुनाव के दौरान राकांपा की पीठ में छुरा भोंकते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन से अपना अध्यक्ष बनाया इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

बीते तीन दिनों ने विपक्ष ने सत्ताधारी दल की नाक में दम कर रखा था। विपक्ष न सिर्फ किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा पर अड़ा हुआ था बल्कि भाजपा के नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए उनकी खिल्ली भी उड़ा रहा था। बुधवार को जो विपक्ष मंजीरे बजा कर कीर्तन करते हुए नरेंद्र (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) और देवेंद्र (मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस) की नैया डूबने की पैरोडी गा रहा था, गुरुवार को उसकी नाव में ही छेद हो गया। विपक्षी फूट का नतीजा यह हुआ कि विधान परिषद और विधानसभा दोनों में गुरुवार को कुछ हद तक कामकाज शुरू रहा।

विपक्षी फूट देखने को मिली विधानसभा में। विधानसभा में कांग्रेस चाहती थी कि मुख्यमंत्री किसानों की कर्ज माफी के मुद्दे पर स्पष्टीकरण दें। कांग्रेस के नेताओं का कहना था कि जब मुख्यमंत्री किसानों का कर्ज माफ करने से इनकार कर चुके हैं, तो फिर बहस का क्या मतलब। लिहाजा कांग्रेस नेताओं ने हंगामा शुरू किया। अध्यक्ष के आसन के पास पहुंचे, नारेबाजी की और अंत में सदन से बर्हिगमन किया। इसके उलट राकांपा के नेताओं ने सदन की कार्यवाही में हिस्सा लिया। अब कांग्रेस के नेता आरोप लगा रहे हैं कि राकांपा के नेताओं ने विपक्षी एकता को धता बताते हुए भाजपा की मदद की, जिसे वह सांप्रदायिक पार्टी कहती आ रही है। उनका कहना है कि अगर राकांपा विपक्ष में है, तो स्पष्ट रूप से ऐसा नजर आना चाहिए।

दूसरी ओर राकांपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि कांग्रेस उन्हें धर्मनिरपेक्षता का पाठ न पढ़ाए। धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देनेवाली कांग्रेस ने राकांपा की पीठ में खंजर भोंका है। बीते दिनों भंडारा जिला परिषद के चुनाव में कांग्रेस और रांकापा ने मिल कर चुनाव लड़ा था। मगर गोंदिया जिला परिषद के अध्यक्ष के लिए कांग्रेस ने चुनाव बाद भाजपा से गठबंधन कर लिया। हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि ऐसा स्थानीय विधायक गोपालदास अग्रवाल ने किया। अग्रवाल के इस कदम से कांग्रेस के नेताओं को जवाब देना भारी पड़ रहा है।

गोंदिया में राकांपा को सबसे ज्यादा जगह मिली थी। राकांपा और कांग्रेस गठबंधन के मुताबिक राकांपा का अध्यक्ष और कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनना था। मगर कांग्रेस के स्थानीय विधायक गोपालदास चाहते थे कि हर हालत में अध्यक्ष पद कांग्रेस के पास रहे। लिहाजा उन्होंने भाजपा से गठबंधन करके कांग्रेस का अध्यक्ष और भाजपा का उपाध्यक्ष बनवा दिया। राकांपा ने इसे ही पीठ में खंजर भोंकना बताया। राकांपा नेताओं का कहना था कि भंडारा में उन्होंने कांग्रेस की मदद की मगर गोंदिया में कांग्रेस ने उनके साथ विश्वासघात किया।