रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने दोबारा से इस पद पर न रहने का फैसला किया है। उन्होंने शनिवार को कहा कि वे अकादमिक कामों में लौटेंगे। बताया जा रहा है कि उन्होंने यह फैसला भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के बयानों से दुखी होकर लिया हो। स्वामी ने पिछले दिनों राजन पर कई व्यक्तिगत हमले बोले थे। राजन के करीबियों के अनुसार उनका मानना था कि स्वामी के बयानों को सरकार का समर्थन है। स्वामी ने मई महीने से राजन पर हमले बोलना शुरू किया था। उनके इन बयानों पर न तो सरकार में मौजूद किसी मंत्री ने और न भाजपा के किसी नेता ने कड़ा रूख दिखाया।
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स्वामी के बयानों के बाद लगने लगा था कि सरकार भी नहीं चाहती कि राजन दूसरा कार्यकाल लें। इसके बाद राजन को उनके साथियों और करीबी रिश्तेदारों ने फिर से अकादमिक क्षेत्र में लौटने को कहा था। राजन शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। वहां से उन्होंने तीन साल का अवकाश ले रखा है। राजन के विरोध में कम से कम तीन-चार केंद्रीय मंत्री भी थे। उनका कहना था कि राजन ने आक्रामक तरीके से ब्याज दरों में कटौती नहीं की। लेकिन स्वामी के हमलों के बाद मामला बिगड़ गया। उन्होंने तो आरबीआई की ओर से छोटे और पेमेंट बैंकों को लाइसेंस देने के मामले में सीबीआर्इ जांच की मांग कर डाली।
इससे पहले राजन दूसरे कार्यकाल को लेकर गंभीर थे। उन्होंने कहा था कि वे भाग नहीं रहे हैं और काफी अधूरा काम पड़ा है। इस महीने की शुरुआत में उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर भारतीय बाजार के लिए लंबे समय के प्लान पर चर्चा की थी। पिछले 20 साल में राजन पहले गवर्नर होंगे जो पांच साल तक आरबीआई चीफ नहीं रहेंगे। उनसे पहले डी सुब्बाराव, वाईवी रेड्डी और बिमल जालान पांच-पांच साल तक इस पद पर रहे थे।
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स्वामी के हमलों से पहले सामने आया था कि रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय कई मुद्दों पर एकमत नहीं है। हालांकि बाद में कई अधिकारियों को वित्त मंत्रालय से हटा दिया गया था। उनकी जगह नए अधिकारियों को नियुक्ति दी गई थी। इन अधिकारियों के साथ राजन की अच्छी पटती थी।
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