सुप्रीम कोर्ट में हिन्दू मैरिज एक्ट के एक प्रावधान को चुनौती दी गई है। दरअसल यह प्रावधान कोर्ट को शक्ति देता है कि वह अलग रह रहे पति-पत्नी को शादी जारी रखने के लिए शारीरिक संबंध बनाने का आदेश दे सकती है। हिन्दू मैरिज एक्ट के सेक्शन-9 के तहत अलग रह रहे दंपति में से कोई एक यदि कोर्ट जाकर यौन संबंध के अधिकार को बहाल करा लेता है तो उसे एक डिक्री हासिल हो जाती है, जिसमें कोर्ट दूसरे पक्ष (पति/पत्नी) को यौन संबंध बनाने का निर्देश देता है। अगर दूसरा पक्ष कोर्ट के निर्देश को मानने से इंकार कर देता है तो उसके खिलाफ प्रॉपर्टी जब्त करने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। ताजा पीआईएल में हिन्दू मैरिज एक्ट के इसी प्रावधान को चुनौती दी गई है। यह PIL कानून के दो छात्रों ओजस्वा पाठक और मयंक गुप्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने दाखिल की है।

याचिका में कहा गया है कि हिन्दू मैरिज एक्ट का सेक्शन 9 लैंगिक भेदभाव नहीं करता है, लेकिन यह कानून बहुत ही पितृसत्तात्मक और सामंती अंग्रेजी कानून पर आधारित है। देखा गया है कि कोर्ट से डिक्री ज्यादातर पुरुषों द्वारा हासिल की जाती है, जिससे वह अलग रह रही अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं। याचिका में कहा गया कि सेक्शन-9 से उन महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है, जो अपने पति के साथ नहीं रहना चाहतीं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी मर्जी से जीने का अधिकार देता है। कोई भी प्रावधान, जो कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विपरीत शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर करता है, वह संविधान द्वारा व्यक्ति को दी गई व्यक्तिगत स्वायत्ता और गरिमा का उल्लंघन करता है।

पीआईएल में कहा गया है कि भारत में किसी भी पर्सनल लॉ सिस्टम में वैवाहिक रिश्ते के तहत यौन संबंध का अधिकार बहाल करने की व्यवस्था नहीं है। इसकी जड़ें सामंती अंग्रेजी कानून में है, जिसे साल 1970 में ब्रिटेन में भी खत्म कर दिया गया है। पीआईएल में बताया गया है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से बनाई गई एक कमेटी और लॉ कमीशन ने भी यह प्रावधान रद्द करने की सिफारिश की है। पीआईएल में हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 के सेक्शन-9, स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के सेक्शन 22 और कोड ऑफ सिविल प्रॉसिजर, 1908 के ऑर्डर 21, रूल 32 और 33 की वैधता को भी चुनौती दी गई है।