दामोदर घाटी निगम भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। उसी का नतीजा है कि जमीन के मुआवजे और विस्थापितों के पुनर्वास में हुए गुल-गपाड़े की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक गई। विस्थापितों को सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बावजूद न्याय नहीं मिल पाया है। विस्थापित आदिवासी इस मामले की सीबीआइ जांच की मांग कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि झारखंड सरकार ने केंद्र से सीबीआइ जांच की सिफारिश नहीं की तो दस अगस्त से विस्थापित आंदोलन करेंगे।

दामोदर घाटी परियोजना आजादी के तुरंत बाद कोयले से बिजली बनाने के लिए स्थापित की गई थी। पश्चिम बंगाल और बिहार (अब झारखंड) के चार जिलों के आदिवासियों की जमीन और घर इस परियोजना के लिए सरकार ने अधिग्रहण कर लिए थे। घटवार आदिवासी महासभा का आरोप है कि असली विस्थापित तो मुआवजे और पुनर्वास की बाट जोहते रह गए पर दामोदर घाटी निगम के अफसरों ने घूस लेकर ऐसे लोगों को उनके नाम पर नौकरी दे दी, जिनका परियोजना से कोई नाता नहीं था।

घटवार आदिवासी महासभा के रामाश्रय सिंह पिछले चार दशक से मुआवजे और पुनर्वास की जंग लड़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें इंसाफ की उम्मीद बंधी थी। मोदी ने इस साल झारखंड सरकार को रामाश्रय सिंह की शिकायत की जांच के कई बार निर्देश दिए। बकौल रामाश्रय सिंह झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी उनकी व्यथा को गौर से सुना और अप्रैल में जांच के आदेश भी दिए। समय सीमा 30 दिन तय की। इस सीमा में जांच न होने पर जवाबदेह अफसर के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

आदिवासियों का कहना है कि उन्हें इस घोटाले की सीबीआइ जांच की दरकार है। सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी तो दस अगस्त से पंद्रह अगस्त तक वे धनबाद में बेमियादी अर्धनग्न सत्याग्रह करेंगे। बाद में दो दिन भूख हड़ताल पर बैठेंगे। आदिवासियों की पीड़ा यह है कि हर बार उनके आंदोलन को झूठे आश्वासन देकर खत्म कराया गया। पर इंसाफ नहीं किया गया। वे तीन सवालों के जवाब चाहते हैं- पहला निगम ने मैथन और पंचेत के जिन विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के नाम पर उनके कथित सदस्यों को नौकरी दी, उनकी सूची सार्वजनिक की जाए। दूसरा जिन लोगों को जमीन का मुआवजा दिया गया, उनकी जमीन का ब्योरा और मुआवजे की रकम का खुलासा किया जाए। तीसरा चालीस साल पहले पुनर्वास के लिए जिन लोगों की सूची बनाई गई थी, उनके नाम का खुलासा हो। उनका आरोप है कि निगम ने विस्थापितों की जगह दूसरे नौ हजार लोगों को नौकरी दे दी।

विस्थापित आदिवासियों के मुताबिक परियोजना के लिए 15 हजार परिवारों की 38 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। इतना ही नहीं 240 गांवों के पांच हजार मकान भी तोड़े गए थे। पर पुनर्वास केवल पांच सौ विस्थापितों का ही हुआ। भले निगम के अफसर नौ हजार के पुनर्वास का दावा करें। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में 91 विस्थापितों की तरफ दायर याचिकाओं पर सुनाए फैसले में पुनर्वास के लिए बनाई गई निगम की सूची को रद्द कर नई सूची बनाने की हिदायत दी थी। पर उस आदेश पर अमल के नाम पर लीपापोती कर दी गई।