तमिलनाडु में विधानसभा द्वारा पारित किए गए 10 विधेयकों को लंबे समय तक राज्यपाल आरएन रवि की मंजूरी ना मिलने के मामले में हाल सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए बिल पर फैसला लेने के लिए समयसीमा भी तय कर दी। अब इस मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला लिया है। केंद्र इसी सप्ताह रिव्यू पिटीशन दाखिल कर सकती है।

केंद्र सरकार का क्या तर्क

केंद्र सरकार का मानना है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा तय करने से संवैधानिक अराजकता बढ़ सकती है। इस मामले में केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करेगी। इस मामले में विधि विभाग से भी राय ली जा रही है।

’90 दिन में लेना होगा फैसला’

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए प्रेषित विधेयकों पर विचार करने का संदर्भ मिलने की तिथि से तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए। ऐसा पहली बार है जब राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समयसीमा तय की गई हो। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि राज्यपाल के पास ‘पॉकेट वीटो’ यानी किसी भी फाइल को अनिश्चित काल तक अपने पास लंबित रखने का अधिकार नहीं है।

क्या सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को सलाह दे सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का भी जिक्र किया कि राज्य स्तर पर राज्यपाल के पास यह ताकत नहीं रहती कि वो फैसला ले पाए कि किस बिल को संवैधानिक कोर्ट में भेजना है या नहीं। ऐसे में सविधान तो सिर्फ एक ही रास्ता दिखाता है, राज्यपाल उस बिल को राष्ट्रपति के पास भेज दे और फिर राष्ट्रपति आर्टिकल 143 का इस्तेमाल करे। सर्वोच्च अदालत के मुताबिक सरकरिया और Punchhi कमिशन भी स्पष्ट रूप से कह चुका है कि आर्टिकल 143 के तहत राष्ट्रपति कोर्ट से सुझाव ले सकता है जब किसी बिल की संवैधानिक वैधता पर सवाल आता है।