आधार नंबर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। पांच जजों की संविधान पीठ ने बहुमत से आधार की संवैधानिक वैधता पर मुहर लगा दी है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने यह निर्णय दिया है। पीठ में शामिल जस्टिस अशोक भूषण ने कई मसलों पर बहुमत के फैसलों से असहमति जताई है। खासकर सरकारी सुविधाओं के मामले में जस्टिस भूषण ने अहम टिप्‍पणी की है। उन्‍होंने कहा कि वह बहुमत के फैसले के साथ हैं, लेकिन तीन मसलों पर उनकी राय अलग है। जस्टिस भूषण ने कहा, ‘आधार के नाम पर उचित लाभार्थियों को सब्सिडी, सरकारी सुविधाओं और अन्‍य लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता है।’ उन्‍होंने आधार कानून की धारा 57 को भी रद्द कर दिया। इसके तहत निजी कंपनियों को आधार का इस्‍तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। साथ ही जस्टिस भूषण ने स्‍पष्‍ट किया कि लोकसभा अध्‍यक्ष द्वारा किसी बिल को धन विधेयक के तौर पर पारित कराने का फैसला भी न्‍यायिक समीक्षा (ज्‍यूडीशियल रिव्‍यू) के दायरे में आएगा।

निजता का हनन नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में आधार को निजता का हनन मानने से भी इनकार कर दिया। संविधान पीठ ने कहा कि आधार से निजता के अधिकार का हनन नहीं होता है। बता दें कि आधार को अनिवार्य बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दर्जनों याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें से अधिकांश अर्जियों में आधार को जरूरी बनाने के कदम को निजता के अधिकार का उल्‍लंघन बताया गया था। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इसे खारिज कर दिया है। पीठ में सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस एके. सीकरी, जस्टिस एएम. खानविलकर, जस्टिस डीवाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे। मालूम हो कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने बहुमत के फैसले के विरुद्ध जाते हुए आधार को अवैध करार दिया। उन्‍होंने आधार को धन विधेयक के तौर पर पारित कराने के कदम को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया। बता दें कि राज्‍यसभा में पर्याप्‍त बहुमत न होने के कारण केंद्र सरकार ने आधार बिल को लोकसभा में धन विधेयक के तौर पर पेश किया था। इसके बाद ही आधार कानून में परिवर्तित हो सका।