प्रदीप कुमार राय

खेत-खलिहान में विभिन्न बीज बोने का एक खास मौसम होता है। वो मौसम निकला, तो बीज डालने का फायदा ही नहीं। ऐसे ही मनुष्य के जीवन में संस्कार का बीज डालने की एक ही ऋतु है। मानव जीवन की इस ऋतु विशेष का नाम है ‘बचपन’। खेत- खलिहान में बीज रोपने से चूक जाएं या रोपण उपरांत यह खराब हो जाए, तो अगली ऋतु दूसरा अवसर लाती है। लेकिन मानव जीवन की सभी ऋतु एक ही बार आती हैं। यानी संस्कार का बीज ऋतुराज बचपन में ढंग से डल गया और उसका सही पोषण हो गया, तो ठीक, अन्यथा दोबारा वो मौका नहीं आता और बड़े होने तक आदतें पक चुकी होती हैं, जिसमें बदलाव मुश्किल है। यहां संस्कार का अर्थ है- बच्चों का ऐसा प्रशिक्षण जिससे वो देश और समाज को सही परिप्रेक्ष्य में समझ सकें। उनकी स्वतंत्र सोच, आलोचनात्मक चिंतन (क्रिटिकल थिकिंग) व सार्थक प्रश्न करने की योग्यता को निखरने देना।

बच्चों में ऐसे संस्कार के बीजारोपरण के महत्त्व को इतनी गंभीरता से समझने की आज क्या जरूरत है? जरूरत बड़ी भारी है। दरअसल, मौजूदा हालात में पूरा संसार अधिप्रचार, मिथ्या सूचनाओं और इनसे जुड़ी हिंसक घटनाओं से कर्राह उठा है। बिजली की गति से बहती भ्रामक सूचनाओं के इस दौर में लोगों को भड़काने, भरमाने और भटकाने वाले बहुत जल्दी प्रभाव डालते हैं। इसलिए संसार के बहुत देश प्रयासरत है कि उनके नागरिकों का इतना सजग बोध हो कि वो अधिप्रचार या मिथ्या प्रचार का हिस्सा न बनें। वे अविचारित ‘स्ट्रांग रिएक्शन’ कर पहले से भड़की, भड़काई चीजों को और न भड़काएं। स्वाभविक है कि इस संस्कार का आरंभ किसी न किसी रूप में बचपन से होना जरूरी है। इसके मद्देनजर संसार के बहुत देश स्कूलों में आलोचनात्मक चिंतन की पढ़ाई पर बल दे रहे हैं। भारत की नई शिक्षा नीति का उद्देश्य भी बच्चों को आलोचनात्मक चिंतक बनाना है। यह उद्देश्य प्राप्ति बहुत कठिन नहीं, पर इतनी सरल भी नहीं। इसलिए इसके सभी पक्षों को धैर्य से समझ लिया जाए।

ऐसा नहीं है कि संसार में अब तक सजग सचेत नागरिक नहीं। खूब हैं। लेकिन झूठे प्रचार और एक गलत तरह के अनुकूलन ने बड़े सयाने देशों पर हाल में जो असर डाला, उससे नागरिक निपुणता पर नए सिरे से विचार आरंभ हुआ। आज ऐसे नागरिकों पर विश्व का मंगल निर्भर है जो अधिप्रचार को समझें, भटकाने वाली सूचनाओं को करारा जवाब दें। साथ ही उन्हें अपनी अनुक्रिया और प्रतिक्रिया में उचित, अनुचित का अहसास हो। विश्वविख्यात चिंतक एलडस हग्जले व जोर्ज ओरवेल का कथन है- ‘लोकतंत्र तो उम्मीदों पर तब खरा उतरे, जब सजग, स्पष्ट जानकारी रखने वाले नागरिक हों।’ उक्त तथ्य की निरंतरा में इस बात को समझना जरूरी है कि अब तो संसार में शारीरिक हिंसा से ज्यादा भाषा की हिंसा यानी ‘कम्युनिकशेन वायलेंस’ की चिंता हो रही है। इसका अर्थ कि शब्दों से मतभेद पैदा करना, शब्दों से लोगों के मन मस्तिष्क पर चोट करने की समस्या ने विश्व में नफरत फैला दी है। इसके प्रति नागरिकों की सजगता लाजिमी है।

यूनेस्को के कम्युनिकेशन विभाग ने तो आगामी पूरे साल ‘कम्युनिकेशन वॉयलेंस’ के समाधान पर ही अपना कार्य करने का निश्चय किया है। उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार के नागरिक तैयार करने का लक्ष्य संसार ने रखा है। उसकी बुनियाद में बचपन का प्रशिक्षण है। अब सवाल यह है कि कौन हमारे बच्चों की कोरी स्लेट पर अपनी मर्जी के संस्कार की कहानी लिख रहा है। हम हल्के से अहसास से समझ सकते हैं कि हमारे बच्चे कार्टून कार्यक्रमों से इस समाज के मायने समझ रहे हैं। गैजेट्स पर विभिन्न वीडियो गेम उनकी ध्यानाकर्षण शक्ति पर काबिज है। बच्चों को इनके हवाले छोड़ शायद अधिकांश लोग यह चिंतन भूल गए हैं कि परिवार के बड़े लोगों से सत्य, असत्य का बोध जानते हुए जो बच्चा संस्कारित होता था, उसके बिना बच्चे का चिंतन नहीं निखरता। ऐसे में वयस्कों को पहले स्मरण करना पड़ेगा कि बच्चे को संस्कारित करने के मायने क्या हैं? यह समझेंगे, तो हम आगे बढ़ेंगे।

अब मुद्दा यह है कि अब तक आपके बच्चों के चिंतन का निर्माण कौन रहा है? यह सभी अभिभावकों को पता है कि उनके बच्चे की सोच को गढ़ रहा है टीवी और मोबाइल उत्पादित कन्टेंट। इसमें क्या संगत है, क्या असंगत। उसकी चर्चा करने की फुर्सत मुश्किल ही किसी अभिभावक के पास है। लेकिन अपने बच्चे को सजग, सचेत व आलोचनात्मक समझ वाला बनाने के लिए यह चर्चा अभिभावकों को बच्चों के साथ निरंतर करनी ही होगी।
– प्रदीप कुमार राय
(सहायक प्रोफेसर, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय)