CJI Surya Kant News: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के हरियाणा दौरे के दूसरे दिन खुली जीप में सवार होकर हांसी जिले में अपने पैतृक गांव पेटवाड़ पहुंचे। यहां उनके सम्मान में एक समारोह रखा गया था। उनके साथ कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी मौजूद रहे। सीजेआई ने अपने स्कूल के दिनों और 10वीं क्लास की परीक्षा की तैयारियों को याद किया।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सूर्यकांत ने याद किया कि उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा, हाई स्कूल और 10वीं क्लास की शिक्षा गांव के स्कूल में उस समय पूरी की थी जब सुविधाएं बहुत कम थीं। गांव में एक को-एजुकेशनल मिडिल स्कूल था, टीचरों की संख्या कम थी और छात्र अक्सर जमीन पर बैठकर पढ़ाई करते थे। उन्होंने कहा कि इन सीमाओं के बावजूद, शिक्षकों का समर्पण असाधारण था।

उन्होंने मदनहेरी के अपने इंग्लिश टीचर मास्टर प्रेम सिंह को स्नेहपूर्वक याद किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “वे हमें रात 11 बजे तक पढ़ाते थे और धान के भूसे से बिछे कमरे में सोते थे। यह केवल पढ़ाई नहीं थी, बल्कि यह मां-बाप जैसी तपस्या थी।” उन्होंने आगे कहा कि शिक्षक ने ऐसा केवल इसलिए किया ताकि प्रतिभाशाली ग्रामीण बच्चे परीक्षा पास कर सकें और जीवन में आगे बढ़ सकें। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि आज उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है, वह उनके शिक्षकों और गांव के बुजुर्गों के आशीर्वाद के कारण है।

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मेरे पिता ने मुझे अपना रास्ता चुनने की इजाजत दी- मुख्य न्यायाधीश

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी याद किया कि 10वीं क्लास पास करने के बाद उनके पिता ने उनके सभी भाइयों को इकट्ठा किया और उनसे कहा कि वे अपनी मर्जी के अनुसार आर्ट्स और लॉ की पढ़ाई करें। उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता ने मुझे अपना रास्ता खुद चुनने की इजाजत दी।” उन्होंने यह भी बताया कि सरकारी नौकरियों और कंपटीटिव एग्जाम के बारे में चर्चा होने के बावजूद, उनके परिवार ने उनकी रुचि का सम्मान किया।

बच्चों को अपने करियर का चुनाव खुद करने दें- सूर्य कांत

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों को अपने करियर का चुनाव खुद करने दें, भले ही इसमें आर्थिक कठिनाई शामिल हो। उन्होंने कहा, “धन का सबसे बड़ा स्रोत शिक्षा है।” उन्होंने आगे कहा कि प्रतिभाशाली बच्चों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी केवल अभिभावकों पर नहीं बल्कि पूरे गांव पर होनी चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने मित्र थलूराम को भी याद किया। उनके पिता खेतों में काम करते थे और उन्होंने आशीर्वाद देते हुए बस इतना कहते थे, “आप गांव का नाम रोशन करें।”

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