सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि केंद्र सरकार POCSO Act में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज लाने पर विचार करे। शीर्ष अदालत ने यह सुझाव इसलिए दिया है कि ऐसा होने से उन किशोरों को आपराधिक मुकदमों से छूट मिल सकेगी जो आपसी सहमति से रिश्ते बनाते हैं। भले ही उनकी उम्र 18 साल से कम हो और उनके बीच उम्र का अंतर काफी कम हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़े मामले में दिए गए फैसले में यह बात कही।

कानून सचिव को भेजी जाए कॉपी

अदालत ने कहा, “इन कानूनों के दुरुपयोग का बार-बार न्यायिक संज्ञान लिया गया, इस फैसले की एक कॉपी भारत सरकार के कानून सचिव को भेजी जाए ताकि इस खतरे को रोकने के लिए संभव कदम उठाए जा सकें जिसमें मुख्य रूप से रोमियो-जूलियट क्लॉज को शामिल करना शामिल है। यह क्लॉज किशोरों के रिश्तों को कानून के शिकंजे से छूट देगा। एक ऐसा तंत्र बनाना जो उन लोगों पर मुकदमा चलाने में सक्षम हो, जो इन कानूनों का इस्तेमाल करके हिसाब बराबर करना चाहते हैं।”

पत्नी को अबॉर्शन कराने से नहीं रोक सकता पति, दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नाबालिग को जमानत देते समय जांच एजेंसियों को पीड़ितों की उम्र तय करने के लिए जांच की शुरुआत में ही हड्डियों की जांच (ऑसिफिकेशन टेस्ट) जैसे मेडिकल टेस्ट कराने का निर्देश दिया था।

हाईकोर्ट के निर्देशों को किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्देशों को रद्द कर दिया और देखा कि यह किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के खिलाफ हैं। इस अधिनियम की धारा 94 में पीड़ित की उम्र तय करने की प्रक्रिया बताई गई है।

अधिनियम की धारा 94 क्या कहती है?

यह धारा कहती है कि उम्र पहले मैट्रिक या किसी समकक्ष प्रमाण पत्र के आधार पर तय की जाएगी, ऐसा न होने पर नगर निगम या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र को माना जाएगा। अगर ये दस्तावेज नहीं होते हैं तब ही ऑसिफिकेशन टेस्ट जैसे किसी मेडिकल टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है।

जस्टिस करोल ने अपने फैसले में उन मामलों में POCSO Act के गलत इस्तेमाल को स्वीकार किया, जहां रिश्ता आपसी सहमति से होता है लेकिन एक पक्ष तकनीकी रूप से नाबालिग होता है।

‘अदालत को हल्के में मत लेना’

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मुकदमे अक्सर युवा रिश्तों को अपराध बना देते हैं और न केवल आरोपी बल्कि पीड़ित और उनके परिवारों के लिए भी इसके नतीजे बेहद गंभीर होते हैं। ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज को कई जगहों पर मान्यता मिली हुई है। यह रेप कानूनों में एक अपवाद है, जहां दोनों पक्षों के बीच उम्र का अंतर बहुत कम होता है और रिश्ता आपसी सहमति से होता है।

कोर्ट ने अपने फैसले की कॉपी विधि और न्याय मंत्रालय के सचिव को भेजने का निर्देश दिया। अदालत ने सुझाव दिया कि विधायिका इस तरह के सुरक्षा उपायों को लागू करने पर विचार करे।

अदालत ने सिफारिश की कि ऐसे लोगों को सजा देने के लिए एक सिस्टम बनाया जाए, जो निजी दुश्मनी निकालने या सामाजिक दबाव डालने के लिए जानबूझकर POCSO Act के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करते हैं।

बीजेपी-आरएसएस के सात कार्यकर्ताओं को उम्रकैद, सीपीएम नेता की हत्या के मामले में कोर्ट का फैसला